विदेश मामलों के विशेषज्ञ के.पी. फैबियन / IANS
हाल ही में अंतिम रूप दिए गए भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर विदेश नीति और रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता भारत की बढ़ती वैश्विक मोलभाव शक्ति को दर्शाता है और साथ ही देश की आर्थिक आत्मनिर्भरता को बनाए रखते हुए एक अहम कूटनीतिक उपलब्धि है।
विदेश मामलों के विशेषज्ञ के.पी. फैबियन ने इस समझौते को अपेक्षित बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच सीधे संवाद ने लंबे समय से चली आ रही अड़चन को दूर करने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब रुपये पर दबाव बना हुआ था, इसलिए कुछ पहलुओं में यह भारत के लिए सकारात्मक है।
फैबियन ने कहा, “भू-राजनीति में अगर कोई देश अमेरिका के साथ मजबूत संबंध नहीं रखता, जबकि वह अन्य वैश्विक शक्तियों से जुड़ा हो, तो उसकी स्थिति कमजोर हो सकती है। ऐसे में अमेरिका के साथ रिश्तों को मजबूत करना जरूरी है।” हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि समझौते की कुछ शर्तें पूरी तरह भारत के पक्ष में नहीं हो सकतीं, क्योंकि अमेरिका अपने निर्यात पर शून्य शुल्क की मांग करता है और अपने विशाल घरेलू बाजार के प्रभाव को लगातार रेखांकित करता है।
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मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) ध्रुव सी. काटोच ने भी इस समझौते को भारत के लिए लाभकारी बताया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप की कार्यशैली अक्सर पहले फैसले सार्वजनिक करने और बाद में प्रतिक्रियाओं का आकलन करने की रही है। काटोच के अनुसार, यूरोपीय संघ और यूनाइटेड किंगडम के साथ भारत के बढ़ते व्यापारिक संबंधों ने उसकी बातचीत की स्थिति को और मजबूत किया है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत की ऊर्जा खरीद नीति आर्थिक हितों पर आधारित रहेगी। काटोच ने कहा कि भारत पहले भी वेनेजुएला से तेल खरीद चुका है, और यदि प्रतिबंधों में ढील मिलती है तथा कीमतें अनुकूल रहती हैं, तो भविष्य में वहां से तेल आयात पर विचार किया जा सकता है। “भारत वहीं से तेल खरीदेगा, जहां उसे सबसे बेहतर कीमत मिलेगी,” उन्होंने कहा।
पूर्व राजनयिक जे.के. त्रिपाठी ने शुल्क में कटौती को भारत द्वारा बनाए गए रणनीतिक दबाव का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि भारत ने ईएफटीए जैसे संगठनों और ब्रिटेन व जर्मनी जैसे देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत कर अमेरिका पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव बनाया।
त्रिपाठी ने कहा, “भारत 1.4 अरब की आबादी वाला विशाल बाजार है और अमेरिका को यह चिंता थी कि अगर समझौते में देरी हुई, तो वह आर्थिक अवसर खो सकता है।” उनके अनुसार, यह समझौता भारत के आत्मविश्वासपूर्ण और संतुलित वैश्विक व्यापार दृष्टिकोण को दर्शाता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह व्यापार समझौता वैश्विक व्यापार परिदृश्य में भारत की भूमिका को और मजबूत करता है, साथ ही घरेलू आर्थिक हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करता है।
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