अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और पीएम मोदी / IANS
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा सोशल मीडिया पर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ फोन पर बातचीत और भारत-अमेरिका व्यापार समझौते पर सहमति की जानकारी साझा करने के बाद देश की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। विपक्ष की ओर से सवाल उठने लगे हैं और आलोचना शुरू हो गई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यह विरोध अभी समय से पहले है, क्योंकि समझौते का पूरा ब्योरा अब तक सार्वजनिक नहीं हुआ है।
गौरतलब है कि हाल ही में भारत द्वारा यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ के साथ किए गए व्यापार समझौतों पर भी इसी तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिली थीं। आने वाले समय में न्यूजीलैंड के साथ किसी संभावित व्यापार समझौते पर भी ऐसे ही सवाल उठने की संभावना जताई जा रही है।
फिलहाल राष्ट्रपति ट्रम्प और अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स के सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर जो शोर मच रहा है, वह वास्तविक तथ्यों से ज्यादा अटकलों पर आधारित बताया जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बिना आधिकारिक दस्तावेज और विस्तृत शर्तों के सामने आए, समझौते की आलोचना करना वैसा ही है जैसे किसी अप्रकाशित किताब पर हंगामा खड़ा कर देना।
एशियाई मामलों के जाने-माने विशेषज्ञ इवान ए. फाइगेनबाम ने इस पूरे घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए लोगों से संयम बरतने की अपील की है। कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस में स्टडीज के वाइस प्रेसिडेंट फाइगेनबाम ने कहा, “भारत-अमेरिका डील को लेकर मेरी सलाह यही है कि सभी लोग गहरी सांस लें और शांत रहें।”
फाइगेनबाम को अमेरिका की एशिया नीति और भारत-अमेरिका संबंधों का गहरा अनुभव है। वह वॉशिंगटन, नई दिल्ली और सिंगापुर स्थित कार्नेगी कार्यालयों की देखरेख करते हैं और इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्रियों, एक पूर्व ट्रेजरी सेक्रेटरी और कई सीईओ के सलाहकार रह चुके हैं।
आज के दौर में, जब व्यापार ही युद्ध है और टैरिफ हथियार, ऐसे में अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए शुल्क को पहले 50 प्रतिशत (जिसमें 25 प्रतिशत ‘रिसिप्रोकल’ और 25 प्रतिशत ‘दंडात्मक’ शुल्क शामिल था) से घटाकर 18 प्रतिशत करना एक अहम घटनाक्रम माना जा रहा है।
फाइगेनबाम के अनुसार, “18 प्रतिशत का टैरिफ भारत के लिए एक ‘स्मूद लैंडिंग’ है। अगर अमेरिकी टैरिफ अब स्थायी हकीकत हैं, तो असली मायने यह रखते हैं कि प्रतिस्पर्धियों के मुकाबले आपकी स्थिति कैसी है। आसियान देशों पर 19 प्रतिशत और वियतनाम पर 20 प्रतिशत टैरिफ के मुकाबले भारत की स्थिति भारतीय निर्यातकों के लिए बेहतर है।”
आलोचकों का एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या अमेरिका भारत पर यह दबाव बना रहा है कि वह अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए किस देश से तेल खरीदे। भारत की रूस के साथ व्यावहारिक ऊर्जा साझेदारी ने वॉशिंगटन के लिए मॉस्को को अलग-थलग करने की कोशिशों को जटिल बना दिया है।
प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत का हवाला देते हुए ट्रम्प ने पोस्ट किया था, “उन्होंने रूसी तेल खरीदना बंद करने और अमेरिका से, तथा संभवतः वेनेजुएला से, अधिक खरीदने पर सहमति जताई है।”
दिलचस्प बात यह है कि यूरोपीय संघ को भी अमेरिकी राष्ट्रपति पहले यह कहकर फटकार लगा चुके हैं कि वह रूस से ऊर्जा खरीदकर यूक्रेन युद्ध को “फंड” कर रहा है। दिसंबर की शुरुआत में यूरोपीय संघ ने रूसी गैस आयात में कटौती और 2027 के अंत तक पूरी तरह बंद करने का फैसला किया था। हालांकि तब तक युद्धविराम या किसी समझौते की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
फाइगेनबाम ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में यह भी कहा कि “मुझे इस पर संदेह है कि भारत सरकार रूसी तेल से जुड़ी किसी प्रतिबद्धता को खुले तौर पर समझौते का हिस्सा बनाएगी। अगर मैं गलत साबित होता हूं, तो देखा जाएगा।” उन्होंने यह भी बताया कि वर्ष 2024 में अमेरिका से भारत को 41.5 अरब डॉलर का सामान और 41.8 अरब डॉलर की सेवाओं का निर्यात हुआ। ऐसे में ट्रम्प द्वारा भारत के साथ व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का दावा काफी महत्वाकांक्षी लगता है। फाइगेनबाम के शब्दों में, “महत्वाकांक्षा अच्छी बात है, लेकिन 83 अरब डॉलर से सीधे 500 अरब डॉलर तक पहुंचना थोड़ा खिंचा हुआ लगता है।”
अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिन्स का यह बयान कि नया भारत-अमेरिका समझौता अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के विशाल बाजार तक पहुंच दिलाएगा और इससे ग्रामीण अमेरिका को फायदा होगा, अन्य देशों के साथ हुए व्यापार समझौतों में भी इसी तरह की भाषा से मेल खाता है।
यूरोपीय संघ ने भी भारत के साथ हुए हालिया समझौते के बाद अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर कहा था कि “दोनों पक्षों ने सबसे संवेदनशील कृषि उत्पादों को उदारीकरण से बाहर रखने पर सहमति जताई है, ताकि बाजार पहुंच और संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा के बीच संतुलन बना रहे।”
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे किसी भी व्यापार समझौते का वास्तविक असर समय और शर्तों पर निर्भर करता है। इसलिए जब तक भारत सरकार औपचारिक रूप से समझौते का पूरा विवरण सामने नहीं लाती—जिसकी उम्मीद जल्द की जा रही है—तब तक किसी भी तरह का निष्कर्ष निकालना या डर फैलाना सही नहीं होगा।
न्यू इंडिया अब्रॉड की अन्य खबरों को पढ़ने के लिए क्लिक करें।
ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT
Comments
Start the conversation
Become a member of New India Abroad to start commenting.
Sign Up Now
Already have an account? Login