प्रवासी भारतीय / Courtesy: Handout
भारतीय प्रवासियों के लिए भारत को कुछ वापस देना केवल एक 'परोपकार' का काम नहीं है, बल्कि यह एक गहरा कर्तव्य है। पहली पीढ़ी के प्रवासियों के लिए इसका मतलब अपने परिवार की मदद करना, गांव के स्कूलों में योगदान देना या किसी संकट (जैसे 2001 का गुजरात भूकंप) के समय एकजुट होना रहा है। इसे 'दान', 'सेवा' या 'सदका' के रूप में देखा जाता है—एक ऐसी जिम्मेदारी जो हमारी संस्कृति और पहचान से जुड़ी है।
समय के साथ बदलती सोच
एआईएफ के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के अनुसार, पिछले दो दशकों में परोपकार की सोच और उसके क्रियान्वयन में बड़ा परिवर्तन आया है। अब शिक्षा के क्षेत्र में केवल स्कूल भवन बनाना पर्याप्त नहीं माना जाता, बल्कि बच्चों के सीखने के परिणामों को बेहतर बनाना प्राथमिक लक्ष्य है। स्वास्थ्य सेवाओं में भी सिर्फ क्लीनिक खोलने के बजाय सरकारी स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत और टिकाऊ बनाना प्राथमिकता बन गया है। वहीं आजीविका के क्षेत्र में अल्पकालिक राहत की जगह ऐसे स्थायी मॉडल विकसित किए जा रहे हैं, जो लोगों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाएं और उन्हें दीर्घकालिक अवसर प्रदान करें।
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अगली पीढ़ी: 'चैरिटी' से 'चेंजमेकर' तक
लेख के अनुसार, नई पीढ़ी के भारतीय-अमेरिकी ‘सेवा’ को पारंपरिक दान की सीमाओं से बाहर ले जा रहे हैं। वे केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रहते, बल्कि यह भी पूछते हैं कि सफलता की परिभाषा कौन तय करता है और परोपकार की शक्ति किसके हाथ में केंद्रित है। उनके लिए दान देना महज लेन-देन नहीं, बल्कि जीवन के उद्देश्य, पहचान और न्याय की भावना से गहराई से जुड़ा हुआ है। तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस दौर में वे पुराने मॉडलों को दोहराने के बजाय समुदायों के साथ मिलकर नए, टिकाऊ और दूरदर्शी समाधान सह-निर्मित करना चाहते हैं।
भविष्य की ओर: एक सामूहिक शक्ति
अगले 25 वर्षों में, भारतीय प्रवासियों का दान और भी अधिक 'मूल्यों पर आधारित' और 'आपस में जुड़ा हुआ' होगा। अब सफलता को केवल इस आधार पर नहीं मापा जाएगा कि कितनी बड़ी मदद की गई, बल्कि इस आधार पर कि वह मदद कितनी टिकाऊ है।
लेखक न्यूयॉर्क स्थित अमेरिकन इंडिया फाउंडेशन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।
(इस लेख में व्यक्त विचार और राय लेखक के व्यक्तिगत हैं और ये आवश्यक नहीं कि वे इंडिया अब्रॉड की आधिकारिक नीति या रुख को दर्शाते हों।)
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