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व्यापार और भू-राजनीति 2025: जब हकीकत ने वैश्विक व्यापार की दिशा पलट दी

भारत के लिए 2025 में तस्वीर मिली-जुली रही। अमेरिका के साथ आक्रामक टैरिफ बड़ी बाधा बने, लेकिन चुनिंदा डी-रिस्किंग के चलते इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और डिजिटल सेवाओं में भारत आंशिक लाभार्थी भी बना।

प्रतीकात्मक तस्वीर / pexels

वर्ष 2025 ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था की बुनियादी धारणा को झकझोर कर रख दिया। मेरी 2023 में प्रकाशित पुस्तक The Global Trade Paradigm में यह तर्क दिया गया था कि वैश्वीकरण समाप्त नहीं हो रहा, बल्कि पुनर्संतुलन (रीकैलिब्रेशन) के दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां दक्षता आधारित वैश्विक मूल्य शृंखलाएं (GVCs) धीरे-धीरे लचीलापन, विविधीकरण और भू-राजनीतिक समझ को अपनाएंगी। लेकिन 2025 में जो हुआ, वह पुनर्संतुलन नहीं बल्कि एक तीखा विच्छेद था। भू-राजनीति ने केवल व्यापार को प्रभावित नहीं किया, बल्कि उसे अपने अधीन कर लिया।

सबसे पहले, व्यापार के जरिए बनी आर्थिक परस्परनिर्भरता को एक ताकत नहीं, बल्कि कमजोरी के रूप में देखा जाने लगा। प्रतिबंध (सैंक्शन्स) अब सिर्फ वित्तीय साधन नहीं रहे; वे ऊर्जा, तकनीक, पूंजी बाजार और लॉजिस्टिक्स तक फैल गए। व्यापार प्रवाह स्वयं ‘फ्रंटलाइन हथियार’ बन गए।

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टैरिफ की निर्णायक वापसी
टैरिफ एक बार फिर औद्योगिक और भू-राजनीतिक नीति के संरचनात्मक औजार बनकर लौटे। भुगतान संतुलन या घरेलू उद्योग संरक्षण के नाम पर लगाए गए शुल्क अब भू-राजनीतिक संरेखण थोपने और सप्लाई चेन व निवेश के स्थान तय करने का जरिया बन गए। राष्ट्रीय सुरक्षा, जलवायु और तकनीकी नियंत्रण के तर्कों ने WTO-युग के उस वर्जन को कमजोर कर दिया, जिसमें एकतरफा व्यापार बाधाओं को वर्जित माना जाता था।

कंपनियों से आगे बढ़कर राज्यों का दखल
यह अपेक्षा थी कि लचीलापन मुख्यतः कंपनियां अपनाएंगी और सरकारें सहायक भूमिका में रहेंगी। 2025 में तस्वीर उलट गई। सरकारें—कंपनियों से अधिक—सप्लाई चेन के पुनर्गठन की अगुवा बन गईं। औद्योगिक नीति आर्थिक रणनीति के केंद्र में आ गई। सब्सिडी, लोकल कंटेंट नियम, निर्यात नियंत्रण और निवेश स्क्रीनिंग तेजी से बढ़े। सख्त सेमीकंडक्टर निर्यात नियंत्रण जैसे कदमों ने युद्धोत्तर व्यापार सहमति से निर्णायक दूरी का संकेत दिया।

अमेरिकी व्यापार समझौतों का बदला स्वरूप
अमेरिका ने व्यापक, बाज़ार-प्रवेश आधारित मुक्त व्यापार समझौतों से दूरी बनाते हुए ‘फ्रेमवर्क’ आधारित व्यवस्थाओं को तरजीह दी। ये ढांचे लचीले जरूर हैं, लेकिन दीर्घकालिक निवेश के लिए अनिश्चितता भी बढ़ाते हैं। अब व्यापार रियायतें नियम-आधारित नहीं, बल्कि सशर्त, द्विपक्षीय और समय-सीमित होती जा रही हैं—जहां बाज़ार पहुंच, सब्सिडी या नियामकीय राहत के बदले भू-राजनीतिक सहयोग मांगा जाता है।

चीन से डी-कपलिंग तेज
उन्नत सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लीन एनर्जी और रक्षा से जुड़े क्षेत्रों में चीन से अलगाव तेज हुआ। उपभोक्ता वस्तुओं का व्यापार जारी रहा, लेकिन रणनीतिक तकनीकों में कठोर ब्लॉक बन गए। एक जोखिम यह है कि एक एकीकृत वैश्विक प्रणाली की जगह सीमित इंटरऑपरेबिलिटी वाली समानांतर प्रणालियां उभरें।

बहुपक्षवाद की कमजोर होती रीढ़
विश्व व्यापार संगठन (WTO) का विवाद निपटान तंत्र लगभग हाशिये पर चला गया। व्यापार नियम अब सहमति से कम और शक्ति संतुलन से अधिक तय होने लगे। सहयोगियों के बीच भी प्रतिस्पर्धा बढ़ी—पूंजी, प्रतिभा और मैन्युफैक्चरिंग क्षमता खींचने की होड़ में औद्योगिक प्रतिस्पर्धा ने सहयोग की जगह ले ली।

वैश्वीकरण का सामाजिक अनुबंध टूटा
असमानता और राजनीतिक प्रतिक्रिया की चिंताओं ने समावेशी विकास को बढ़ावा देने के बजाय संरक्षणवाद, राष्ट्रीय प्राथमिकता और आर्थिक-तकनीकी संप्रभुता को हवा दी—भले ही इसकी आर्थिक लागत स्पष्ट हो। व्यापार नीति घरेलू राजनीति का नारा बन गई, जिससे तकनीकी समझौते की गुंजाइश और सिमट गई।

आंकड़े क्या कहते हैं
2024–25 में नाममात्र GDP बढ़ने के बावजूद वैश्विक व्यापार मूल्य लगभग स्थिर रहे। रणनीतिक क्षेत्रों—सेमीकंडक्टर, क्रिटिकल मिनरल्स, क्लीन-एनर्जी उपकरण—में व्यापार भू-राजनीतिक रेखाओं पर पुनर्निर्देशित हुआ। अब वैश्विक व्यापार दक्षता नहीं, बल्कि संरेखण, नियंत्रण और लचीलेपन के लिए अनुकूलित हो रहा है।

भारत और ग्लोबल साउथ के लिए मायने
भारत के लिए 2025 में तस्वीर मिली-जुली रही। अमेरिका के साथ आक्रामक टैरिफ बड़ी बाधा बने, लेकिन चुनिंदा डी-रिस्किंग के चलते इलेक्ट्रॉनिक्स असेंबली और डिजिटल सेवाओं में भारत आंशिक लाभार्थी भी बना—बाजार आकार, जनसांख्यिकी और रणनीतिक संरेखण के सहारे। ग्लोबल साउथ के लिए नियम-आधारित व्यवस्था से लेन-देन आधारित ढांचों की ओर शिफ्ट ने राज्य क्षमता, वार्ता कौशल और नीति समन्वय की मांग बढ़ा दी है। जिन देशों की विकास रणनीति पूर्वानुमेय बाज़ार पहुंच पर टिकी है, वे अधिक नुकसान में हैं।

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