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गांधी, एल्विस और कोयंबटूर में क्या है कॉमन? मूंगफली की कहानी

द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, कैफ़े का इंटीरियर मूंगफली-थीम पर आधारित है — मिट्टी के रंग, रस्सियों से बने लैंप और शेल-शेप लाइट्स।

प्रतीकात्मक तस्वीर / Pexels

कभी 'गरीब आदमी की काजू' कही जाने वाली मूंगफली अब न सिर्फ रसोई का हिस्सा है बल्कि ग्लोबल स्वाद की कहानी बन चुकी है। अमेरिका से लेकर दक्षिण भारत तक, यह सादा सी दाल अब 'सुपरफूड' का दर्जा पा चुकी है — प्रोटीन से भरपूर, दिल के लिए फायदेमंद और स्वाद में बेमिसाल।

इस बदलाव की अगुवाई कर रहा है कोयंबटूर का एक अनोखा कैफ़े — 'पुट कडलाई कैफ़े', जहां मूंगफली को कला और नवाचार के संग मिलाया गया है। 'कडलाई' तमिल में मूंगफली को कहते हैं, जबकि 'पुट' अंग्रेज़ी का 'put' — यानी 'हर चीज़ में मूंगफली डालो और देखो क्या होता है।'

कैफ़े की अनोखी पेशकश

‘द हिंदू’ की रिपोर्ट के मुताबिक़, कैफ़े का इंटीरियर मूंगफली-थीम पर आधारित है — मिट्टी के रंग, रस्सियों से बने लैंप और शेल-शेप लाइट्स। मेन्यू में हैं — कडलाई मिताई फ्रेंच टोस्ट (भारतीय चिक्की से प्रेरित), चिकन करीज़ा (करी और पिज़्ज़ा का फ्यूज़न), करुपट्टी मिल्कशेक, जो गुड़ और नारियल दूध से बना है। लंच टाइम पर 'नोरुक्स कॉर्नर' में शेफ्स मूंगफली, मुरुक्कू और थट्टई के साथ पीनट चाट तैयार करते हैं, जिसे नारियल के खोल में परोसा जाता है।

कैफ़े के संस्थापकों ने एक साल के प्रयोग के बाद इसे शुरू किया। उन्होंने 15 अलग-अलग फ्लेवर्स तैयार किए — फायरी चिली करमेल, पुलियोगरे, तंदूरी मसाला से लेकर हॉट चॉकलेट पीनट्स तक। उनके मुताबिक़, 'यह चिप्स या फ्रेंच फ्राइज़ से कहीं ज़्यादा हेल्दी विकल्प है।'

यह भी पढ़ें- समोसे से लेकर केसर कॉकटेल तक: अमेरिका के स्वाद पर छा गया भारतीय खाना

मूंगफली की यात्रा — खेतों से ग्लोबल टेबल तक

मूंगफली की कहानी वैश्वीकरण से भी पुरानी है। 7,000 साल पहले इसका जन्म पेरू में हुआ था, और पुर्तगाली व्यापारियों ने इसे 16वीं सदी में भारत लाया। सूखे में पनपने वाली यह फसल जल्दी ही दक्कन के मैदानों की मिट्टी में जम गई। तेल के रूप में शुरू होकर मूंगफली धीरे-धीरे भारतीय रसोई का हिस्सा बन गई — चटनी, करी, चाट और चिक्की में। महाराष्ट्र से लेकर उत्तर भारत तक, सर्दियों की शामों में भुनी मूंगफली आज भी पहचान का स्वाद है।

गांधी से एल्विस तक — एक दिलचस्प कड़ी

पत्रकार विक्रम डॉक्टर ने द इकोनॉमिक टाइम्स (2007) में बताया कि महात्मा गांधी मूंगफली बटर के शौकीन थे। लंदन में पढ़ाई के दौरान उन्होंने यह आदत अपनाई और दक्षिण अफ्रीका के आश्रम तक ले गए। गांधी के साथी प्रो. एन.आर. मल्कानी के अनुसार, 'वे केले के साथ मूंगफली बटर खूब खाते थे।' दिलचस्प बात यह है कि यही संयोग अमेरिका में भी देखा गया — एल्विस प्रेस्ली को भी पीनट बटर और बनाना सैंडविच बेहद पसंद था। डॉक्टर ने लिखा, 'शायद यही एक चीज़ है जो गांधी और एल्विस को जोड़ती है।'

भारत–अमेरिका का स्वाद रिश्ता

मूंगफली की भारत-अमेरिका कड़ी यहीं खत्म नहीं होती। मसूरी में अमेरिकी मिशनरियों ने भारतीय बाज़ार में सबसे पहले होममेड पीनट बटर की शुरुआत की थी। लेखक रसकिन बॉन्ड ने याद किया कि विन्सेंट हिल स्कूल में सेवंथ डे एडवेंटिस्ट्स मिशन के लोग इसे परोसते थे, और बाद में यह शहर के दुकानों में बिकने लगा।

गांधी के टिन से लेकर एल्विस की कड़ाही और कोयंबटूर के कैफ़े तक — मूंगफली ने समय, संस्कृतियों और महाद्वीपों को पार करते हुए हर बार खुद को नए रूप में पेश किया है। कभी जिसे 'गरीब आदमी की काजू' कहा जाता था, वही आज दुनिया के खानपान की शाही मेज़ पर अपनी जगह बना चुकी है।

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