मां शारदा... / Tapasya Chaubey
पीले कपड़े, पीली चूड़ियां, पीले सिंदूर से सजी महिलाएं बसंत के स्वागत में खिली-खिली सी। गुलाल उड़ाते लोग, शुभ काम की शुरुआत, ओंम के साथ अक्षर ज्ञान आरंभ। नई कनिया-बेटी की विदाई। पुआ-पकवान और ऋतु फल से भरा थाल, यह सब नजारा माता सरस्वती के आगमन और उनके आशीर्वाद की तैयारी का है। वसंत की उमग है।
अमेरिका में क्या सरसों, क्या गुलाल, क्या वसंत… बेटी/बहू विदा हो के यूं आई की मां बेचारी सगुन-संदेश भी नहीं कर पाई। सगुन की चूड़ी नहीं आई तो क्या मां की दी कई चूड़ियां राह देखती हैं त्योहारों की। मैं हरा या गुलाबी कोई भी पहन, माता का स्वागत करूंगी। वसंत के गीत गाऊंगी।
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सरसों न सही... मेरे घर के द्वार पर गेंदे के दो-चार फूल मुस्काने लगे हैं। बेटा हाथ में झाल, डमरू लेकर ठोकने -बजाने का खेल रचने लगा है और मन में उम्मीद के गुलाल उड़ते रहते हैं।
वैसे परदेश के सुख बहुत हैं पर ऋतुओं का सम्मोहन भारत में ही हैं। खेतों में पसरी सरसों मानो धरती हल्दी लगाये सगुन के इंतजार में हो। चने और मटर की छिम्मियां और हल्के सफेद-बैगनी, गुलाबी फूल मन को मिठास से भर जाते। माता के चरणों से उड़ते गुलाल सारे वातावरण को गुलाबी कर देते कि इसी बीच किसी मीठे कंठ से सरस्वती वंदना फूट पड़ती;
हे माता सरस्वती शारदा
विद्या दानी, दयानी, दुःख हरिणी,
जगत जननी, ज्वालामुखी
माता सरस्वती शारदा
कीजे सुदृष्टि
सेवक जान अपना इतना वरदान दीजे
तान, ताल, और अलाप, बुद्धि अलंकार शारदा
हे माता सरस्वती शारदा
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