इसरो की तस्वीर। / IANS/ISRO
साल 2026 मानव अंतरिक्ष उड़ान के इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होने वाला है। इस वर्ष भारत और अमेरिका दो ऐसे ऐतिहासिक मिशनों की तैयारी कर रहे हैं, जो अंतरिक्ष खोज की दिशा और रफ्तार दोनों बदल देंगे। जहां भारत का गगनयान कार्यक्रम देश को स्वतंत्र मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता वाले चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करेगा, वहीं अमेरिका का आर्टेमिस-II मिशन करीब पांच दशक बाद इंसानों को एक बार फिर पृथ्वी की निचली कक्षा से बाहर यानी गहरे अंतरिक्ष की ओर ले जाएगा।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने महत्वाकांक्षी गगनयान कार्यक्रम के तहत पहला बिना मानव वाला ऑर्बिटल टेस्ट मिशन 'जी1' वर्ष 2026 के मार्च के आसपास लॉन्च करने का लक्ष्य रखा है। यह मिशन मानव-रेटेड एलवीएम3 (गगनयान-एमके3) रॉकेट से प्रक्षेपित किया जाएगा और इसे भारत का पहला बड़ा ऑर्बिटल मानव मिशन टेस्ट माना जा रहा है।
इस मिशन में 'व्योममित्रा' नामक एक मानवरूपी रोबोट को अंतरिक्ष में भेजा जाएगा, जिसे इस तरह तैयार किया गया है कि वह अंतरिक्ष यात्रियों जैसी गतिविधियों और प्रतिक्रियाओं का अनुकरण कर सके। गगनयान जी1 को लगभग 300 से 400 किलोमीटर की निम्न पृथ्वी कक्षा (एलईओ) में संचालित किया जाएगा, ताकि मानव मिशन से पहले सभी अहम प्रणालियों की कड़ी जांच की जा सके।
गगनयान भारत के लिए केवल एक अंतरिक्ष मिशन नहीं, बल्कि पूरी तरह स्वदेशी मानव अंतरिक्ष उड़ान क्षमता का प्रमाण है। इस मिशन के दौरान जीवन-रक्षा प्रणाली, क्रू मॉड्यूल का सुरक्षित वायुमंडलीय पुनः प्रवेश, पैराशूट आधारित समुद्री रिकवरी, मिशन कंट्रोल और संचार व्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियों का परीक्षण किया जाएगा।
अगर जी1 और इसके बाद होने वाले परीक्षण सफल रहते हैं, तो भारत उन गिने-चुने देशों में शामिल हो जाएगा जो अपने दम पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने और सुरक्षित वापस लाने की क्षमता रखते हैं। इससे भविष्य में भारतीय स्पेस स्टेशन, निजी मानव अंतरिक्ष सेवाओं और व्यावसायिक अंतरिक्ष मिशनों के नए रास्ते खुलेंगे, साथ ही विदेशी निर्भरता भी कम होगी।
दूसरी ओर, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा अपने बहुप्रतीक्षित आर्टेमिस-II मिशन की तैयारी में है, जिसे अप्रैल 2026 तक लॉन्च किए जाने का लक्ष्य है। इस मिशन में चार अंतरिक्ष यात्री करीब 10 दिनों की यात्रा पर जाएंगे और चंद्रमा की परिक्रमा करेंगे। यह 1972 में अपोलो-17 के बाद पहला मौका होगा, जब इंसान निम्न पृथ्वी कक्षा से बाहर कदम रखेगा।
आर्टेमिस-II, नासा के स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस) रॉकेट और ओरियन अंतरिक्ष यान के लिए एक निर्णायक परीक्षण उड़ान है। इस मिशन में गहरे अंतरिक्ष में नेविगेशन और संचार, अंतरिक्ष विकिरण से सुरक्षा, लंबी अवधि की जीवन-रक्षा प्रणालियों और पृथ्वी से बहुत दूर मिशन संचालन जैसी अहम क्षमताओं की जांच की जाएगी।
इस दौरान अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा से करीब 5,000 नॉटिकल मील आगे तक जाएंगे, जो मानव इतिहास की अब तक की सबसे दूर की मानव अंतरिक्ष उड़ान होगी। यह मिशन भविष्य में चंद्रमा पर लैंडिंग, स्थायी चंद्र अड्डों और अंततः मंगल मिशन की नींव रखेगा।
गगनयान और आर्टेमिस-II मिलकर यह साफ संकेत देते हैं कि 2030 के दशक में मानव अंतरिक्ष उड़ान एक नए, बहुध्रुवीय दौर में प्रवेश करने जा रही है। भारत जहां निम्न पृथ्वी कक्षा में अपनी मजबूत उपस्थिति बना रहा है, वहीं अमेरिका अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ गहरे अंतरिक्ष में वापसी की तैयारी कर रहा है।
इन मिशनों से विकसित होने वाली तकनीकें, जैसे चालक दल की सुरक्षा, अंतरिक्ष यान प्रणालियां, मिशन प्रबंधन और दीर्घकालिक जीवन समर्थन आने वाले वर्षों में व्यावसायिक स्पेसफ्लाइट, राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन और गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण की दिशा तय करेंगी।
ऐसे में, साल 2026 केवल दो मिशनों का साल नहीं, बल्कि मानव द्वारा भविष्य के लिए अंतरिक्ष की खोज को नई दिशा देने वाला साल साबित हो सकता है।
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