साध्वी भगवती सरस्वती। / X/ SadhviBhagawati
भारत में रहने वाली अमेरिकी आध्यात्मिक गुरु और मोटिवेशनल स्पीकर साध्वी भगवती सरस्वती ने अमेरिका की 250वीं वर्षगांठ के मौके पर देशभक्ति और राष्ट्रीय पहचान पर अपने विचार साझा किए हैं।
गंगा नदी के किनारे पिछले लगभग 30 सालों से अपने घर में रह रहीं सरस्वती का कहना है कि अमेरिका से लंबे समय तक दूर रहने के बावजूद उनके मन में अपने देश के लिए प्यार कम नहीं हुआ है, बल्कि उन्हें देश की तरक्की और मौजूदा गंभीर चुनौतियों को निष्पक्ष नजरिए से देखने की एक खास तरह की स्पष्टता मिली है।
एक सबस्टैक पोस्ट में, उन्होंने अमेरिका के उस बुनियादी सिद्धांत की तारीफ की जिसके तहत आम लोग बिना किसी राजशाही के खुद पर शासन कर सकते हैं। उन्होंने इसे दुनिया के लिए अमेरिका का सबसे बड़ा तोहफा बताया। हालांकि, उन्होंने देश के ऐतिहासिक विरोधाभासों पर भी खुलकर बात की और कहा कि जिन लोगों ने यह लिखा था कि सभी इंसान समान पैदा हुए हैं, उन्हीं में से कई लोग दूसरे इंसानों को अपना गुलाम बनाकर रखते थे।
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सरस्वती ने रचनात्मक आलोचना को देशभक्ति का ही एक काम बताते हुए लिखा कि रोशनी से प्यार करने का मतलब यह नहीं है कि हम यह दिखावा करें कि कहीं कोई परछाई नहीं है। देश की तुलना बढ़ते हुए बच्चे से करते हुए उन्होंने कहा कि सच्चे प्यार का मतलब है देश को उसके सबसे ऊंचे आदर्शों के प्रति जवाबदेह ठहराना।
वे कहती हैं कि मैंने बहुत से लोगों को यह कहते सुना है कि आलोचना करना देशभक्ति नहीं है। लेकिन जब हम किसी से प्यार करते हैं और चुपचाप उन सभी कमियों को नजरअंदाज कर देते हैं जिनकी वजह से वे अपनी पूरी क्षमता के अनुसार काम नहीं कर पा रहे हैं तो वह प्यार नहीं है। वह डर है। वह आज्ञाकारिता है।
उन्होंने मार्टिन लूथर किंग जूनियर, हैरियट टबमैन और रोजा पार्क्स जैसी हस्तियों का जिक्र किया, जो आम नागरिक थे और जिन्होंने अमेरिका के वादे और असलियत के बीच की खाई को पाटने का काम किया।
साध्वी कहती हैं कि वे आम लोग थे जिन्होंने तय किया कि अमेरिका के वादे और असलियत के बीच की खाई को भरना उनकी जिम्मेदारी है। यही असली अमेरिकी खूबी है- टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि आम लोगों की वह हिम्मत जो देश को उसके अपने बुनियादी मूल्यों के प्रति जवाबदेह बनाती है।
सरस्वती ने नस्ल, धर्म और राजनीति के आधार पर आज के बंटवारे पर गहरी चिंता जताई और चेतावनी दी कि स्वस्थ असहमति अब कड़वी दुश्मनी में बदल गई है। उन्होंने कहा कि लेकिन देश की नींव ऐसी नहीं थी। इसे ऐसे लोगों के समूह ने बनाया था जो उलझे हुए थे, बहस करते थे और जिनमें कई कमियां थीं, लेकिन वे मिलकर कुछ नया बनाने की कोशिश कर रहे थे।
पाठकों को यह याद दिलाते हुए कि मूल निवासियों को छोड़कर सभी अमेरिकी आप्रवासियों (बाहर से आकर बसने वालों) की संतानें हैं, उन्होंने राजनीतिक और सामाजिक आधार पर बांटने वाली पहचानों से ऊपर उठकर आपसी इंसानियत को अपनाने का आग्रह किया।
अपनी बात खत्म करते हुए, सरस्वती ने इस युवा देश के लिए प्रार्थना की कि जैसे-जैसे यह आगे बढ़ रहा है, यह बंटवारे से मिलने वाले सस्ते सुकून के बजाय दया और एकता को चुने।
उन्होंने अपनी बात इस तरह खत्म की कि किसी देश के लिए ढाई सौ साल बहुत कम होते हैं। यह देश अभी भी उस रूप में ढल रहा है जिसका उसने वादा किया था। और मुझे पूरे दिल से यकीन है कि वह ऐसा कर सकता है। अगर हम यह याद रखें कि हम हमेशा से, हर हाल में, एक ही पक्ष में रहे हैं।
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