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बिग बैंग सुधारों के बाद अब आंतरिक क्रांति जरूरी, तभी बनेगा ‘विकसित भारत’

लेख में कहा गया है कि आर्थिक सुधार देश के “हार्डवेयर” की तरह हैं, लेकिन असली परिणाम “सॉफ्टवेयर” यानी लोगों की मानसिकता और भावनात्मक स्थिति से तय होते हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर / Generated using AI

भारत सरकार द्वारा हाल ही में पेश किए गए ‘बिग बैंग’ आर्थिक सुधार—जैसे आयकर कानून में बड़ा बदलाव, जीएसटी 2.0, बीमा क्षेत्र में 100% एफडीआई और महत्वाकांक्षी VB-G RAM G पहल—देश को ‘विकसित भारत’ की दिशा में ले जाने वाला ऐतिहासिक मोड़ माने जा रहे हैं। इन सुधारों के जरिए लालफीताशाही कम करने, 1961 के बाद पहली बार कर प्रणाली को सरल बनाने और श्रम कानूनों के आधुनिकीकरण का मजबूत ढांचा तैयार किया गया है।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बाहरी आर्थिक सुधार अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। 1.4 अरब लोगों की वास्तविक क्षमता को खोलने के लिए भारत को ‘External Excellence’ के साथ-साथ ‘Internal Emotional Excellence’ यानी आंतरिक भावनात्मक उत्कृष्टता पर भी राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान देना होगा।

लेख में कहा गया है कि आर्थिक सुधार देश के “हार्डवेयर” की तरह हैं, लेकिन असली परिणाम “सॉफ्टवेयर”—यानी लोगों की मानसिकता और भावनात्मक स्थिति—से तय होते हैं। इतिहास और प्रबंधन विज्ञान के उदाहरण बताते हैं कि यदि कार्यबल में भय, क्रोध, अहंकार और तनाव जैसे नकारात्मक भाव हावी हों, तो सबसे उन्नत सिस्टम भी बेहतर प्रदर्शन नहीं दे पाते।

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भगवद्गीता के सिद्धांतों का हवाला देते हुए लेखक ने मानव मानसिकता के तीन घटकों—सत्व (संतुलन, सत्य, करुणा), रजस (महत्वाकांक्षा, अहंकार, लालच) और तमस (आलस्य, भ्रम, हिंसा)—का उल्लेख किया। उनका तर्क है कि किसी भी राष्ट्र की आंतरिक उत्कृष्टता इन गुणों के सामूहिक संतुलन पर निर्भर करती है। सत्व की अधिकता से सहयोग, रचनात्मकता और नवाचार बढ़ते हैं, जबकि रजस और तमस की प्रधानता से सामाजिक तनाव और हिंसा जन्म लेती है।

लेख में चार प्रमुख क्षेत्रों में आंतरिक भावनात्मक उत्कृष्टता के प्रभाव को रेखांकित किया गया है—अर्थव्यवस्था और उत्पादकता, रचनात्मकता व नवाचार, स्वास्थ्य और कल्याण, तथा सामाजिक सौहार्द। मुंबई के डब्बावालों के उदाहरण के जरिए बताया गया कि उनकी सिक्स सिग्मा स्तर की दक्षता केवल प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि उनकी आंतरिक प्रतिबद्धता और संतुलन से आती है।

लेखक का सुझाव है कि भारत को एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करना चाहिए, जिसमें वैज्ञानिक आध्यात्मिकता, योग (सही अर्थों में ‘योग’ यानी जुड़ाव) और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को शिक्षा, कॉरपोरेट गवर्नेंस और कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनाया जाए। इससे आर्थिक सुधारों का प्रभाव कई गुना बढ़ सकता है।

निष्कर्ष में कहा गया है कि सरकार ने सुधारों के जरिए रास्ता साफ कर दिया है, अब जरूरत है नागरिकों को आंतरिक रूप से सशक्त बनाने की। बाहरी ‘बिग बैंग’ के बाद अब समय है एक ‘आंतरिक क्रांति’ का, ताकि भारत न केवल आर्थिक समृद्धि हासिल करे, बल्कि शांति, स्वास्थ्य और वैश्विक नेतृत्व का भी उदाहरण बने।

लेखक यूनिवर्सिटी ऑफ लुइसविल के केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के पूर्व अध्यक्ष और प्रोफेसर एमेरिटस हैं तथा अमेरिका में सिक्स सिग्मा और एडवांस्ड कंट्रोल्स के अध्यक्ष हैं।

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