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H-1B कर्मचारियों के ‘खून के पैसे’ से खड़े हुए बड़े कॉरपोरेट साम्राज्य: तनुल ठाकुर

इशानी दत्तगुप्ता को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में ठाकुर ने बताया कि भारतीय IT बूम और H-1B सिस्टम की पड़ताल करने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली। उन्होंने इस चिंता पर भी बात की कि सिस्टम की आलोचना को भारतीय कामगारों के खिलाफ जेनोफोबिया माना जा सकता है। ठाकुर का कहना है कि दो भारतीय IT पेशेवरों और एक अमेरिकी कर्मचारी की कहानी आखिरकार सत्ता, अस्तित्व और इंसानी आज़ादी की कहानी बन गई।

 तनुज ठाकुर, 'वाइल्ड वाइल्ड ईस्ट: एक्साइल्ड अमेरिकन्स, एनस्लेव्ड इंडियंस एंड द सिस्टमिक अब्यूज़ ऑफ़ द H-1B वीजा प्रोग्राम' के लेखक तनुज ठाकुर, 'वाइल्ड वाइल्ड ईस्ट: एक्साइल्ड अमेरिकन्स, एनस्लेव्ड इंडियंस एंड द सिस्टमिक अब्यूज़ ऑफ़ द H-1B वीजा प्रोग्राम' के लेखक / Courtesy Photo

तनुल ठाकुर एक पत्रकार, फिल्म समीक्षक और लेखक हैं। उनकी पहली किताब *Wild Wild East: Exiled Americans, Enslaved Indians and the Systemic Abuse of the H-1B Visa Programme* उनके अपने अनुभवों पर आधारित है, जब वह H-1B वीजा की उम्मीद में इंजीनियरिंग छात्र के रूप में अमेरिका गए थे। किताब में तीन मुख्य किरदारों की आपस में जुड़ी यात्राओं के जरिए ठाकुर ने अमेरिकी टेक इंडस्ट्री की कड़वी सच्चाइयों को सामने रखा है। इसमें देसी कंसल्टेंसी नेटवर्क, छात्र वीजा घोटाले, श्रम शोषण और अमेरिकी गेस्ट वर्कर सिस्टम की मानवीय कीमत को दिखाया गया है।

इशानी दत्तगुप्ता को दिए एक विस्तृत इंटरव्यू में ठाकुर ने बताया कि भारतीय IT बूम और H-1B सिस्टम की पड़ताल करने की प्रेरणा उन्हें कहां से मिली। उन्होंने इस चिंता पर भी बात की कि सिस्टम की आलोचना को भारतीय कामगारों के खिलाफ ज़ेनोफोबिया माना जा सकता है। ठाकुर का कहना है कि दो भारतीय IT पेशेवरों और एक अमेरिकी कर्मचारी की कहानी आखिरकार सत्ता, अस्तित्व और इंसानी आज़ादी की कहानी बन गई।

संपादित अंश:

आपकी किताब में आपने तीन असली लोगों की जिंदगी को बिना उनकी पहचान छिपाए सामने रखा है। यह कितना मुश्किल था?

यह बहुत मुश्किल था क्योंकि यह बेहद संवेदनशील मुद्दा है और लोगों की रोज़ी-रोटी सीधे इससे जुड़ी है — चाहे अमेरिकी हों या भारतीय। ज्यादातर भारतीय वर्क वीजा धारक बात करने से डरते हैं क्योंकि उन्हें अपने इमिग्रेशन स्टेटस की चिंता रहती है। मैंने बहुत लोगों से संपर्क किया। अधिकांश ने बात नहीं की, जो ठीक है। कुछ ने तो मुझे किताब लिखने से भी रोका क्योंकि उन्हें लगा कि मैं उनकी रोज़ी-रोटी पर हमला कर रहा हूं। लेकिन दुनिया की खूबसूरती यह है कि हर जगह कुछ पागल लेकिन बहादुर लोग मिल ही जाते हैं, जो सही काम करने के लिए जीते हैं।

इसी तरह मेरी मुलाकात यूट्यूबर कुमार पंद्रुवाड़ा से हुई, जिनकी कहानी मैंने किताब में लिखी है। वह एक्टिविस्ट हैं और अमेरिका में भारतीय कामगारों के साथ हो रहे अन्याय पर लंबे समय से बोलते रहे हैं, खासकर भारतीय नियोक्ताओं द्वारा किए जा रहे शोषण पर।

फिर कुमार के जरिए मेरी मुलाकात वर्जिल बियर्स्वेल से हुई। अमेरिकी कर्मचारी भी ब्लैकलिस्ट और बैन होने से डरते हैं। लेकिन वह MAGA मानसिकता वाले नहीं थे, जैसा लोग मान लेते हैं। वह अमेरिकी सिस्टम के भीतर गहराई से जुड़े हुए इंसान हैं और इससे इंसानी जटिलता सामने आती है। नौकरी जाने की बात करने वाला हर गोरा आदमी नस्लवादी नहीं होता।

ज्यादातर अमेरिकी टेक कर्मचारियों से अलग वह बहुत बहादुर थे क्योंकि अक्सर कर्मचारियों को निकालने के बाद उनसे उनके रिप्लेसमेंट को ट्रेन करवाया जाता है और फिर NDA साइन करवाकर मीडिया से बात करने से रोका जाता है।

फिर मनु मित्रा थे, जो एक्टिविस्ट नहीं थे। वह बस सामान्य जिंदगी जी रहे थे लेकिन उनका अतीत बेहद दर्दनाक था। उन्होंने भी खुलकर अपनी कहानी साझा की।

मुझे इन लोगों से यही एहसास मिला कि “यह हमारे साथ हुआ और हम चाहते हैं कि आप हमारी कहानी बताएं।” उनका मकसद था कि कोई और इस तरह के घोटालों का शिकार न बने।

किताब में जिन भारतीयों की बात है, वे सिस्टम के शिकार भी हैं और उसी सिस्टम को आगे बढ़ाने वाले भी। क्या यह आपके लिए समस्या थी?

कुछ लोग अमेरिका यह जाने बिना पहुंचे कि वहां क्या हो रहा है, लेकिन सच्चाई जानने के बाद भी उनके पास वापस लौटने का विकल्प था। यह बेहद जटिल सिस्टम है जिसमें आसान पक्ष चुनना मुश्किल है।

कहानी का एक बड़ा बिंदु यही है कि पीड़ित खुद भी एक तरह से उत्पीड़क बन जाता है और इस बड़े ‘स्कैम कार्टेल’ का हिस्सा हो जाता है। सिर्फ वहां मौजूद रहने से आप किसी अमेरिकी या ग्रीन कार्ड धारक ईमानदार कर्मचारी की जगह ले रहे होते हैं।

लेकिन मेरी किताब का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह भी है कि मैं कहानी सुनाता हूं, सिर्फ संपादकीय राय नहीं देता। हां, मेरा अपना स्पष्ट दृष्टिकोण जरूर है।

भारत वापस क्यों नहीं आए — इसका जवाब भी आसान नहीं है। भारत में पर्याप्त सम्मानजनक नौकरियां नहीं हैं, लोग जजमेंटल हैं, कई लोगों पर भारी कर्ज है। बहुत से छात्र अमेरिका जाकर वापस लौटने पर समाज में फिट नहीं बैठते। ऊपर से ग्रीन कार्ड का सपना हमेशा उनके सामने लटकता रहता है, भले ही वह कई साल दूर हो।

क्या आपको उन भारतीयों के लिए भी सहानुभूति है जो खुद घोटालों का हिस्सा बने?

कहानी का दूसरा पक्ष भी है। मेरी सहानुभूति खत्म नहीं होती, लेकिन कुछ मामलों में मैं आलोचनात्मक जरूर हो जाता हूं। कुछ छात्र अमेरिका सिर्फ सिस्टम को धोखा देने के लिए जाते हैं, बेईमान कंसल्टेंट्स की मदद से।

मैं संकीर्ण नहीं दिखना चाहता, लेकिन यह कुछ खास राज्यों और क्षेत्रों में ज्यादा आम है।

अक्सर परिवार और दोस्तों के बड़े नेटवर्क इन घोटालों को चलाने में मदद करते हैं। यही वजह है कि अमेरिका में H-1B भारतीय कर्मचारियों के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है।

इन घोटालों में शामिल कई लोग अपने बनाए कार्टेल पर गर्व करते हैं। जबकि असल में ये नेटवर्क सेक्स रैकेट, रियल एस्टेट फ्रॉड और बड़े पैमाने पर शोषण के केंद्र हैं।

हैदराबाद जैसे शहरों में ऐसे लोगों ने भारी पैसा कमाया है। IT कंपनियों, अस्पतालों, रियल एस्टेट कारोबारों और यहां तक कि मंदिरों व चैरिटी संस्थाओं तक में यह पैसा लगा है।

ऐसे ‘खून के पैसे’ से बड़े-बड़े कॉरपोरेट साम्राज्य बने हैं। उदारीकरण के बाद के आधुनिक भारत की यह सबसे शर्मनाक कहानियों में से एक है।

क्या आप अमेरिकी सरकार को H-1B सिस्टम के दुरुपयोग पर कार्रवाई का संदेश देना चाहते हैं?

हाँ, मेरी मंशाओं में एक यह भी थी कि अमेरिकी सरकार कुछ करे क्योंकि आखिरकार जिम्मेदारी उन्हीं की है। लेकिन यही एकमात्र मकसद नहीं था।

मैं कुछ भारतीय कामगारों की जिंदगी के जरिए “आजादी” का मतलब समझना चाहता था। H-1B वीजा मेरे लिए एक रूपक था, उस भारतीय वर्ग की कहानी बताने का जिसे ‘एलीट’ माना जाता है।

छह साल की रिपोर्टिंग और रिसर्च के बाद मुझे लगा कि अमेरिकी सरकार को इस पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि यह समस्या उनके अपने लोगों से भी जुड़ी है।

H-1B कर्मचारियों को एक झूठ बेचा गया। अमेरिकी टेक कर्मचारियों के साथ भी अन्याय हुआ। भारतीय कर्मचारियों को भी सम्मानजनक वेतन मिलना चाहिए।

सिस्टम की खामियां संरचनात्मक हैं और इन्हें दोनों पक्षों के लिए ज्यादा निष्पक्ष बनाया जाना चाहिए। कानून ऐसे हों कि विदेशी वीजा सस्ते श्रम आयात करने का हथियार न बन जाएं। गलत इस्तेमाल करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगना चाहिए।

क्या ट्रंप प्रशासन असली इमिग्रेशन समस्याओं को संबोधित कर रहा है?

आज की राजनीति बेहद बाइनरी और सतही हो चुकी है। कई अमेरिकी उदारवादियों के लिए अगर ट्रंप किसी चीज़ का विरोध करते हैं, तो उसे तुरंत बचाने लगते हैं।

लेकिन न्याय का मतलब है सही बात को सही कहना, चाहे वह किसी भी पक्ष से आए। इस मामले में H-1B सुधारों की ट्रंप प्रशासन की कुछ मांगें बिल्कुल सही हैं।

कई डेमोक्रेट और उदारवादी मीडिया संस्थानों को अमेरिकी कर्मचारियों के मुद्दे पर शर्मिंदा होना चाहिए। प्रगतिशीलता के नाम पर उन्होंने बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों का साथ दिया है।

मैं MAGA समर्थकों द्वारा भारतीय वीजा धारकों के खिलाफ किए गए नस्लवाद की साफ निंदा करता हूं। मेरा मकसद किसी राजनीतिक पक्ष का समर्थन नहीं था, बल्कि H-1B कार्यक्रम की जटिल वास्तविकता को सामने लाना था।

मेरी किताब आधुनिक अमेरिका की तस्वीर भी पेश करती है - एक ऐसा देश जो अब राष्ट्र कम और विशाल कॉरपोरेशन ज्यादा बन चुका है, जहां शिकारी टेक सेक्टर सबसे ऊपर बैठकर बाकी सबकी कीमत पर खुद को अमीर बना रहा है।

क्या आपको लगता है कि आपकी किताब भारतीय टेक कर्मचारियों के लिए “अमेरिकन ड्रीम” की छवि खराब करेगी?

मैंने अपने विचार खुलकर रखे हैं और पाठकों की असहमति का भी स्वागत करता हूं।

मैं भारतीय टेक कर्मचारियों की उपलब्धियों को पूरी तरह स्वीकार करता हूं। बहुत से लोग बेहद प्रतिभाशाली हैं और उन्होंने अमेरिका और भारत दोनों की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान दिया है। कई मायनों में H-1B एक उपयोगी कार्यक्रम है।

मेरा उद्देश्य भारतीय डायस्पोरा की सफलता को कम करना नहीं, बल्कि पूरी तस्वीर सामने रखना है।

अब तक लोगों ने सिर्फ चमकदार पक्ष देखा है क्योंकि मीडिया की कहानी एकतरफा रही है। लेकिन एक अनदेखा पक्ष भी है — सिस्टम की खामियों को छिपाने के लिए कुछ लोगों की बेईमानी, और अमेरिकी थिंक टैंक्स, अकादमिक जगत और नेताओं की भूमिका।

जैसा मेरी किताब के सबटाइटल में कहा गया है, यह सिस्टम के दुरुपयोग को उजागर करने और उन लोगों को आवाज देने की कोशिश है जिनकी आवाज दबा दी गई।

आखिरकार मेरा उद्देश्य दोनों पक्षों के पीड़ितों के प्रति सहानुभूति पैदा करना है।

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