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महाकुंभ को नई दृष्टि से देखती किताब ‘सीकिंग द इन्फिनिट’

पुस्तक ‘सीकिंग द इन्फिनिट’ महाकुंभ को केवल भारतीय या हिंदू आयोजन नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा विरासत के रूप में परिभाषित करती है।

महाकुंभ / Image provided

“महाकुंभ जैसे विराट आयोजन हमें यह बोध कराते हैं कि समूची मानवता के भीतर एक ही दिव्य केंद्र निहित है”। यह पंक्ति याकूब मैथ्यू की हाल ही में प्रकाशित कॉफी टेबल बुक ‘सीकिंग द इन्फिनिट’ में दर्ज है।

आज के समय में, जब व्यक्ति को वाम या दक्षिण जैसे खांचों में खुद को बांधने का दबाव महसूस होता है और किसी भी ओर जाना अभिशाप जैसा प्रतीत होता है। ऐसे दौर में एक निर्भीक और प्रकाशमान पुस्तक का आना अपने आप में एक घोषणा है। नवंबर 2025 में न्यूयॉर्क में आयोजित इंडो-अमेरिकन आर्ट्स काउंसिल (IAAC) लिटरेरी फेस्ट में यह पुस्तक सामने आई और उसने मेल-मिलाप, सौहार्द और सामंजस्य की संभावनाओं की घोषणा की।

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अमृत-कथा से जुड़ा एक विराट आयोजन और अनंत की खोज करती एक विराट पुस्तक ‘सीकिंग द इन्फिनिट’ महाकुंभ को केवल भारतीय या हिंदू आयोजन नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा विरासत के रूप में परिभाषित करती है।

 

ऊषा अकेला / Image Provided

यह पुस्तक जल को शुद्धि, एकता और समर्पण के मूल प्रतीक के रूप में सामने रखती है और महाकुंभ को भारत की ओर से दिया गया वह उद्घोष मानती है, जो यह कहता है कि एकमात्र अंतिम धर्म मानवता है। पाठक इस पुस्तक के तट पर खड़ा होकर आस्था की उन कालातीत लहरों को देख सकता है, जो एक उपचारित और समरस दुनिया की आशा जगाती हैं।

महाकुंभ को पुस्तक में अमर करना
‘आंतरिक यात्रा को समर्पित’ यह पुस्तक याकूब मैथ्यू का वह प्रयास है, जो महाकुंभ की गरिमा और विशालता को सहेजता है। प्रयागराज में आयोजित यह महाकुंभ—जो 144 वर्षों में एक बार पड़ता है—त्रिवेणी संगम पर हुआ, जहाँ बृहस्पति, सूर्य और चंद्रमा की दुर्लभ खगोलीय स्थिति बनती है। 2025 के इस महाकुंभ में अनुमानित 64 करोड़ श्रद्धालुओं ने भाग लिया।

तीन नदियों का संगम गंगा, यमुना और पौराणिक सरस्वती एकता का प्रतीक है। सरस्वती का भौतिक रूप न होना भी आस्था को बाधित नहीं करता। लगभग दो महीनों तक करोड़ों लोगों का शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होना अपने आप में एक चमत्कार है। 246 पन्नों की यह कॉफी टेबल बुक, मनमोहक तस्वीरों, प्रकाशमान उद्धरणों और विचारपूर्ण लेखों के साथ महाकुंभ को अभूतपूर्व ढंग से अमर करती है।

 

याकूब मैथ्यू और उनकी किताब / image provied

बाहरी यात्रा, भीतर की तीर्थयात्रा
पुस्तक की प्रस्तावना ही विरोधाभासों के समाधान का उत्सव है—बाहरी तीर्थयात्रा वास्तव में भीतर की यात्रा है, जहाँ आत्मा उस अव्यक्त तट को छूती है जिसे हम अपने भीतर ढोते हैं। यह पुस्तक स्वयं एक महाकुंभ जैसी परियोजना है—निर्भीक, विराट और उत्कृष्ट निर्माण मानकों वाली। इसके पन्ने पलटना ऐसा है जैसे पाठक स्वयं यात्रा पर निकल पड़ा हो...

पहले अध्याय ‘आशीर्वाद’ में सद्गुरु, स्वामी अवधेशनंद गिरि महाराज, राधानाथ स्वामी और कार्डिनल ओसवाल्ड ग्रेसियस जैसे आध्यात्मिक नेताओं के विचार मिलते हैं, जो आगे गहन चिंतन की धाराओं में ले जाते हैं।

पुस्तक यह याद दिलाती है कि भारत की सभ्यता ने न कभी गहरे प्रश्न पूछने से परहेज किया, न उनके उत्तर खोजने से। रूप और अरूप, आस्था और अज्ञेयवाद, कर्मकांड और ध्यान—इन सबके बीच मानव आत्मा ही अंतिम रहस्यगान बनकर उभरती है।

सीमाओं से परे एक अंतरराष्ट्रीय धरोहर
याकूब मैथ्यू महाकुंभ को भौगोलिक सीमाओं से परे एक अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर के रूप में देखते हैं। खुद को ‘संयोगवश लेखक’ बताने वाले मैथ्यू दरअसल संयोगवश साधक नहीं हैं। सीरियन ईसाई, न्यूयॉर्क स्थित बैंकर याकूब मैथ्यू ने अपनी पत्नी और 18 मित्रों के साथ—एक गंभीर बीमारी के बाद जीवन और 60वें जन्मदिन के उत्सव के रूप में—महाकुंभ यात्रा की।
यही यात्रा इस पुस्तक की प्रेरणा बनी।

 

सद्गुरु के साथ याकूब मैथ्यू / image provided

आध्यात्मिक और सांसारिक दुनिया के बीच सेतु
दिल्ली में बचपन, कम उम्र में विधवा हुई माँ, मदर टेरेसा और बिशप पॉलोस ग्रेगोरियोस जैसे मार्गदर्शकों का सान्निध्य—याकूब के जीवन में आध्यात्मिक बीज वहीं पड़े। साथ ही पी.सी. अलेक्जेंडर और पी.एम. थॉमस जैसे सार्वजनिक जीवन से जुड़े रिश्तेदारों ने उन्हें सत्ता और राजनीति की दुनिया से परिचित कराया।

सेंट ज़ेवियर्स और सेंट स्टीफेंस कॉलेज की शिक्षा, भारतीय ईसाइयत की मानवीय दृष्टि और वैश्विक अनुभवों ने उनके जीवन को आकार दिया। सुविधासंपन्न जीवन ने उनके भीतर के अस्तित्वगत विस्मय को कभी कम नहीं किया।

‘मैं ब्रह्मांड के बुलबुले पर धूल का एक कण था’
2025 का महाकुंभ उनके लिए केवल दृश्य नहीं रहा, बल्कि एक आध्यात्मिक रूपांतरण बन गया। वे लिखते हैं- “मैं ब्रह्मांड के बुलबुले पर धूल का एक नगण्य कण था।” भीड़ का शोर उन्हें आत्मा की धड़कन लगा। संगम में डुबकी उनके लिए विश्व शांति की प्रार्थना बन गई। उनके शब्दों में- “भक्ति में शक्ति”। सूक्ष्म और विराट, आत्मा और ब्रह्मांड सब एक साथ स्पंदित होते दिखे।

55 लेखकों की एक साझा चेतना
पुस्तक में 55 प्रतिष्ठित हस्तियों के लेख हैं, जिनमें स्वामी चिदानंद सरस्वती, कबीर बेदी, शशि थरूर, लॉर्ड मेघनाद देसाई, अनूपम खेर, बरखा दत्त, हाजी सैयद सलमान चिश्ती, स्वामी सर्वप्रियानंद, सुभाष स्वामी, अमिताभ कांत सहित कला, धर्म, विज्ञान, राजनीति, चिकित्सा, खेल और संस्कृति के दिग्गज शामिल हैं। डॉ. दिनेश सिंह सरस्वती को मानवता की धारा मानते हैं। डॉ. अचिंत्य मौलिक के लिए अस्पताल ही उनका महाकुंभ है - “हर धड़कन एक मंत्र।”

एकता में विविधता का सनातन संदेश
यह पुस्तक प्रसिद्ध लोगों का संग्रह मात्र नहीं, बल्कि एक स्वर में गूँजती श्रद्धांजलि है- जो भारत की सनातन चेतना और उसकी वैश्विक भूमिका पर पुनर्विचार कराती है। महाकुंभ का जल आज भी उन सभी के भीतर बह रहा है, जिन्होंने संगम में स्नान किया। जल की तरह ही आस्था की कोई सीमा नहीं होती- वह कठोर हृदयों को भी घिसकर बदल देती है। महाकुंभ हमसे सब मुखौटे उतारने को कहता है- ताकि अंततः एक ही पहचान बचे-मानवता।

पुस्तक: एक जीवित अनुभव
जो लोग महाकुंभ नहीं जा सके, उनके लिए यह पुस्तक स्वयं एक अनुष्ठान है। यह महाकुंभ को आने वाली पीढ़ियों के लिए सजीव बना देती है। अंततः यह बोध उभरता है कि प्रयागराज-मक्का, यरुशलम या काशी की तरह दरअसल मानव हृदय है, जहां सारे विरोधाभास विलीन हो जाते हैं और जहाँ प्रेम ही प्रारंभ, यात्रा और गंतव्य है। जैसा कि कार्डिनल ओसवाल्ड ग्रेसियस लिखते हैं-“यह पुस्तक हमें गहराई से सुनना सिखाती है—अपने हृदय की पुकार, सृष्टि के मौन संगीत और उस एक स्वर को, जो इन दोनों के माध्यम से बोलता है।”

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