प्रतीकात्मक तस्वीर / Unsplash
पिछले कई दशकों तक भारतीय अमेरिकी समुदाय की भाषाई यात्रा लगभग एक जैसी रही। पहली पीढ़ी अपने साथ क्षेत्रीय मातृभाषाओं में पूर्ण दक्षता लेकर आई, जबकि उनकी संतानें धीरे-धीरे “किचन हिंदी” या “टूटी-फूटी बंगाली” जैसी सीमित भाषा में सिमटती चली गईं।
लेकिन 2026 तक आते-आते अमेरिका के न्यू जर्सी से लेकर लॉस एंजेलिस तक डिजिटल स्क्रीन पर एक शांत लेकिन गहरा बदलाव दिखाई देने लगा है। एक नया “भाषा ब्रिज” बन रहा है—और इसे माता-पिता द्वारा थोपे गए शनिवार स्कूल नहीं, बल्कि Gen Z और मिलेनियल भारतीय अमेरिकी प्रोफेशनल्स बना रहे हैं, जो अपनी मातृभाषा की लिपि को बौद्धिक आत्मनिर्भरता और सांस्कृतिक पुनरुद्धार के रूप में अपना रहे हैं।
जरूरत की भाषा से विरासत की भाषा तक
यह बदलाव केवल संवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि उपयोगिता से विरासत की ओर बढ़ता कदम है। जहां पिछली पीढ़ी के लिए अंग्रेजी पेशेवर अस्तित्व की अनिवार्यता थी, वहीं आज की युवा पीढ़ी यह समझ रही है कि बोलचाल में दक्ष होना, लेकिन अपनी ही भाषा की लिपि पढ़ने-लिखने में असमर्थ होना, एक अधूरी जीत है।
लॉस एंजेलिस की 30 वर्षीय वकील प्रार्थना आर. कहती हैं, “मुझे लगता था कि मेरी तेलुगु बहुत अच्छी है, क्योंकि मैं रिश्तेदारों से हंसी-मजाक कर सकती थी और रेस्तरां में बिना परेशानी के खाना ऑर्डर कर लेती थी। लेकिन जब मेरे परदादा का निधन हुआ और उन्होंने चमड़े की जिल्द वाली डायरीज छोड़ीं, तब मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने ही इतिहास से कट चुकी हूं। अब जब मैं उनकी लिखावट पढ़ती हूँ, तो उनकी आवाज, लय और सोच को महसूस कर पाती हूँ—जो अंग्रेजी कभी नहीं दे सकती। यह ऐसा है जैसे अपने ही घर का एक कमरा, जो बीस साल से बंद था, अचानक खुल जाए।”
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डिजिटल लिपि समूहों का उभार
1990 के दशक के उबाऊ शनिवार स्कूलों से अलग, 2026 के ये नए समूह तकनीक-आधारित और समुदाय-केंद्रित हैं। युवा प्रोफेशनल्स अब वर्णमाला की बुनियादी पढ़ाई में अटके नहीं रहते, बल्कि सीधे साहित्य, सुलेख, इतिहास और कविता के माध्यम से लिपि में डूब जाते हैं।
ये शिक्षार्थी रोमन लिपि पर निर्भर होने के बजाय क्षेत्रीय लिपियों की दृश्य संरचना में खुद को पूरी तरह ढाल लेते हैं। वे टैबलेट पर लिखावट अभ्यास के लिए AI आधारित लिपि पहचान तकनीक का उपयोग करते हैं और ऐसे डीप रीडिंग सर्कल्स में भाग लेते हैं, जहाँ शब्दावली नहीं बल्कि क्लासिक साहित्य और कविता पर चर्चा होती है।
लिपि में छिपी आत्मीयता
न्यूयॉर्क में रहने वाले 35 वर्षीय मार्केटिंग एक्जीक्यूटिव निखिल एस., जो हाल ही में एक बंगाली साक्षरता समूह से जुड़े हैं, कहते हैं, “बंगाली लिपि के घुमावों में एक खास आत्मीयता है, जिसे अंग्रेजी कभी दोहरा नहीं सकती। सालों तक मेरे ईमेल और संदेश ‘बॉन्ग्लिश’ में होते थे, जो हमेशा सतही लगते थे। जब मैंने पहली बार अपनी दादी को उनकी लिपि में पत्र लिखा, तो लगा कि मैं पहली बार उनकी भाषा बोल रहा हूँ—सिर्फ़ अपने विचारों का अनुवाद नहीं कर रहा। उस दिन हमारी बातचीत किसी पश्चिमी फ़िल्टर के बिना हुई, और उनकी चिट्ठियों में जो चमक दिखी, वह मैंने दशकों में नहीं देखी थी।”
साक्षरता की नई परिभाषा
जैसे-जैसे ये लिपि-आधारित डिजिटल समूह बढ़ रहे हैं, एक नई पीढ़ी आकार ले रही है, ऐसे वैश्विक भारतीय, जो मैनहैटन में बोर्ड मीटिंग और जयपुर के साहित्य उत्सव दोनों में समान आत्मविश्वास से भाग ले सकते हैं। भाषा ब्रिज अब “जरूरत की टूटी-फूटी भाषा” से नहीं, बल्कि लिपि की स्थायी स्याही से बन रहा है। यह पीढ़ी यह साबित कर रही है कि वास्तविक साक्षरता ही विरासत को बचाने का सबसे बड़ा माध्यम है, ताकि अतीत की कहानियां सिर्फ़ याद न की जाएँ, बल्कि उसी लिपि में पढ़ी जाएँ, जिसमें वे लिखी गई थीं। धीरे-धीरे लेकिन निश्चित रूप से, युवा भारतीय अमेरिकी अपनी मातृभाषा को अपने और आने वाली पीढ़ियों के लिए फिर से हासिल कर रहे हैं।
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