हिमालय पुत्र नैन सिंह रावत / Wikipedia/pexels
19वीं सदी के महान भारतीय खोजकर्ता और सर्वेक्षक पंडित नैन सिंह रावत ने हिमालय और तिब्बत के दुर्गम और अज्ञात क्षेत्रों का नक्शा तैयार कर दुनिया को चौंका दिया था। आज नैन सिंह रावत ((21 अक्टूबर 1830 – 1 फरवरी 1882) की पुण्यतिथि है। ब्रिटिश भारत के समय, जब सीमित तकनीक, ऊँचाई और खतरनाक मौसम के बावजूद नक्शा तैयार करना लगभग असंभव था, नैन सिंह रावत ने अपनी अद्वितीय तकनीक, साहस और चातुर्य से इतिहास रचा।
उन्होंने अपने सर्वेक्षण के दौरान प्रार्थना माला का इस्तेमाल दूरी मापने के लिए किया। उन्होंने हर 100 कदम पर माला के मोती आगे बढ़ाए, जिससे वह पैदल चलते हुए किलोमीटर तक सटीक दूरी का लेखा‑जोखा रख सके। इसी तकनीक के कारण उन्होंने हिमालय की ऊँचाइयों, खाईयों और तिब्बत की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों का सटीक नक्शा तैयार किया। इतिहासकारों ने इसे “माला जपते‑जपते रहस्य खोजने की तकनीक” के रूप में याद किया।
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अपने मिशन के दौरान उन्होंने धार्मिक भिक्षु का भेष धारण किया, ताकि तिब्बती अधिकारियों को उनके वास्तविक उद्देश्य का पता न चले। उनके पास धर्मचक्र और अन्य धार्मिक प्रतीकों के अंदर छुपी उपकरणों के माध्यम से नक्शे और दिशा मापने के यंत्र भी थे। इसी चालाकी और साहसिक प्रयास के कारण उन्हें विश्वभर में “मानव GPS” के रूप में पहचाना गया।
उनकी यात्राओं के कई रोचक किस्से भी प्रचलित हैं। उदाहरण के लिए, तिब्बत की राजधानी ल्हासा में प्रवेश करते समय उन्होंने अपनी पहचान छिपाई रखी, और स्थानीय भिक्षुओं के बीच रहकर गुप्त रूप से क्षेत्र का सर्वेक्षण किया। पैदल चलते हुए कई बार उन्हें हिमानी तूफानों, खतरनाक चट्टानों और बर्फीली खाईयों का सामना करना पड़ा, फिर भी उन्होंने नक्शे और ऊँचाई के रिकॉर्ड पूरे धैर्य के साथ बनाए।
नैन सिंह रावत की ये यात्राएं केवल साहस और विज्ञान की मिसाल नहीं हैं। यह भी दर्शाती हैं कि कैसे भारतीय वैज्ञानिक बुद्धिमत्ता, धैर्य और सरल साधनों का उपयोग कर दुनिया के सबसे दुर्गम रहस्यों को उजागर कर सकते हैं। आज भी उनके नक्शे और रिकॉर्ड सर्वेक्षण जगत में कीमती धरोहर माने जाते हैं।
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