हैदराबाद विश्वविद्यालय में भारतीय प्रवासी और पहचान के मुद्दों पर सम्मेलन का आयोजन किया गया। / University of Hyderabad
हैदराबाद विश्वविद्यालय हेराल्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार, 23 जनवरी को हैदराबाद विश्वविद्यालय में भारतीय प्रवासी समुदाय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों में पहचान के मुद्दों पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया।
'भारतीय प्रवासी समुदाय पर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन: अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में पहचान के मुद्दे' शीर्षक से आयोजित इस कार्यक्रम का आयोजन हैदराबाद विश्वविद्यालय के भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र द्वारा किया गया था। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता सामाजिक विज्ञान संकाय की डीन प्रो. के. सुनीता रानी ने की।
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भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र के प्रमुख और सम्मेलन समन्वयक प्रो. अजय के. साहू ने सम्मेलन के विषय और उद्देश्यों की रूपरेखा प्रस्तुत की। मुख्य अतिथि, केंद्र के संस्थापक और पूर्व निदेशक प्रो. चंद्रशेखर भट्ट ने उद्घाटन सत्र के दौरान अपने विचार व्यक्त किए।
उद्घाटन कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण प्रो. साहू द्वारा संपादित 'रूटलेज हैंडबुक ऑफ एशियन डायस्पोरा एंड नेशनलिज्म' (2026) का विमोचन था। हैदराबाद विश्वविद्यालय के हेराल्ड अखबार के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बिनोद खदरिया ने मुख्य भाषण दिया, जिसमें उन्होंने प्रवासन और प्रवासी अध्ययन के समकालीन मुद्दों पर बात की।
दो सत्रों में अकादमिक चर्चाएं जारी रहीं। प्रो. अपर्णा रायप्रोल की अध्यक्षता में आयोजित द्वितीय सत्र में सिनेमा, लैंगिक श्रम, भाषा संरक्षण, प्रवासी स्मृति और तेलुगु एवं पंजाबी प्रवासी समुदायों के बीच पहचान संबंधी वार्ताओं पर प्रस्तुतियाँ शामिल थीं। वक्ताओं में प्रो. रिधिमा तिवारी, प्रो. सुंदरी अनीता, डॉ. शाज़िया खान, सुश्री बीबा बाबू, डॉ. त्रिलोक चंदन गौड़ और श्री आकाश भाटी शामिल थे।
प्रो. सुचंद्र घोष की अध्यक्षता में आयोजित तृतीय सत्र में अंतर्राष्ट्रीय नेटवर्क, राष्ट्रवाद, डिजिटल प्रवासी समुदाय, वापसी प्रवास, खाड़ी देशों में प्रवास और प्रवासी समुदाय की भागीदारी के बदलते स्वरूपों पर ध्यान केंद्रित किया गया। प्रस्तुतकर्ताओं में प्रो. अंगशुमन कर, प्रो. रुद्र प्रधान, डॉ. अनिंदिता शोम, श्री मुकुल भगत, सुश्री हिधा मूसा और श्री पोदिशेट्टी नरेश शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, सम्मेलन का समापन प्रो. अनीसुर रहमान के नेतृत्व में एक समापन सत्र के साथ हुआ, जिसमें उन्होंने चर्चाओं पर विचार व्यक्त किया और भारतीय प्रवासी समुदायों के अध्ययन में अंतर्विषयक अनुसंधान की भूमिका पर बल दिया।
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