अमेरिकी टैरिफ से निपटने को भारत ने बदली रणनीति / Courtesy AI image/IANS
अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ के चलते संभावित उत्पादन नुकसान से बचने के लिए भारत के निर्यात पैटर्न में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। 2 जनवरी को जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, बदलते टैरिफ माहौल के बीच भारत ने निर्यात में फ्रंटलोडिंग और री-रूटिंग की रणनीति अपनाई है।
बैंक ऑफ बड़ौदा की रिपोर्ट में कहा गया है कि 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ और औपचारिक व्यापार समझौते (FTA) की अनुपस्थिति के कारण भारत की निर्यात टोकरी में संरचनात्मक बदलाव हो रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, समुद्री उत्पादों के मामले में चीन और थाईलैंड को निर्यात हिस्सेदारी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक सामानों में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) को निर्यात बढ़ा है, जबकि रत्न और आभूषण क्षेत्र में हांगकांग की हिस्सेदारी में बड़ा इजाफा दर्ज किया गया है।
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दिपन्विता मजूमदार ने कहा, “हालांकि व्यक्तिगत तौर पर इन देशों की हिस्सेदारी छोटी लग सकती है, लेकिन सामूहिक रूप से निर्यात विविधीकरण, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के साथ बेहतर एकीकरण, प्रतिस्पर्धी कीमतों और बेहतर लॉजिस्टिक्स पर फोकस के जरिए उच्च अमेरिकी टैरिफ के नकारात्मक प्रभाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है, जब तक कि औपचारिक व्यापार समझौता नहीं हो जाता।”
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रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल से अगस्त 2025 के दौरान अमेरिका को निर्यात में तेज फ्रंटलोडिंग देखी गई, ताकि लागत का लाभ उठाया जा सके। वहीं सितंबर से नवंबर 2025 की अवधि में निर्यात में विविधीकरण का रुझान सामने आया, जिसमें अमेरिका को निर्यात कुछ हद तक घटा, जबकि दुनिया के अन्य हिस्सों में निर्यात बढ़ा।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि अमेरिका अब भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार बना हुआ है। आने वाले समय में रेडीमेड गारमेंट्स, रत्न एवं आभूषण, वस्त्र (रेडीमेड गारमेंट्स को छोड़कर), मशीनरी और उपकरण जैसे क्षेत्रों में और अधिक निर्यात विविधीकरण की गुंजाइश है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इन क्षेत्रों में लक्षित नीतिगत पहल से निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाई जा सकती है, जिससे अमेरिकी ऊंचे टैरिफ के कारण होने वाले उत्पादन नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी।
कुल मिलाकर, अमेरिका की प्रमुख भूमिका के बावजूद भारत धीरे-धीरे वैकल्पिक निर्यात बाजार विकसित कर रहा है, ताकि टैरिफ के प्रभाव को कम किया जा सके और वैश्विक स्तर पर अपनी पहुंच को और मजबूत किया जा सके।
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