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हिंदू मंदिरों का ध्वज: आस्था, सुरक्षा और निरंतरता का प्रतीक

मंदिर का ध्वज धरती और आकाश के बीच एक आध्यात्मिक संबंध माना जाता है।

मंदिर का ध्वज (प्रतीकात्मक तस्वीर) / pexels

सदियों से हिंदू मंदिरों पर लहराने वाला ध्वज (ध्वजा) सिर्फ एक कपड़े का टुकड़ा नहीं, बल्कि मंदिर की पवित्रता, उपस्थिति और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। हिमालय से लेकर समंदर किनारे तक, हर मंदिर की ऊंचाई पर लगाया गया ध्वज यह बताता है कि यहां एक पवित्र शक्ति का वास है।

ध्वज: आस्था को आकाश से जोड़ने वाला प्रतीक
मंदिर का ध्वज धरती और आकाश के बीच एक आध्यात्मिक संबंध माना जाता है। मंदिरों में ध्वजा-रोहण यानी ध्वज चढ़ाने की परंपरा आज भी उतनी ही शक्तिशाली है जितनी प्राचीन काल में थी। यह परंपरा हिंदू धर्म के ग्रंथों—पुराणों, आगमों और मंदिर वास्तुशास्त्र—में स्पष्ट रूप से दर्ज है।

शास्त्रों में ध्वज का महत्व
पुराणों में ध्वज को मंदिर का आवश्यक अंग बताया गया है। अग्नि पुराण कहता है कि मंदिर पर ध्वज लगाना अनिवार्य है। मत्स्य पुराण के अनुसार, मंदिर के ध्वज को देखने मात्र से शुभता मिलती है और बाधाएँ दूर होती हैं। स्कंद पुराण में इसे देवता की सुरक्षा-शक्ति का प्रतीक बताया गया है। आगम शास्त्रों में ध्वजा-स्तंभ यानी ध्वज वाले खंभे की बनावट, आकार, सामग्री और पूजा की विधि विस्तार से बताई गई है।

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ध्वज: मंदिर की सुरक्षा-रेखा और ऊर्जा का वाहक
ध्वज मंदिर की सुरक्षा-रेखा और ऊर्जा का वाहक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मंदिर एक शक्ति-क्षेत्र होता है और ध्वज उसकी बाहरी रक्षा परिधि बनाता है। शास्त्रों में इसे वायु-यंत्र कहा गया है, जिसके माध्यम से सकारात्मक ऊर्जा फैलती है; दिक्-रक्षण संकेत, जो चारों दिशाओं में सुरक्षा का प्रतीक है; और तेज का स्रोत, जो देवता की दिव्य आभा को बाहर तक प्रसारित करता है। कई पुराणों में यह भी वर्णित है कि मंदिर के ध्वज के दर्शन मात्र से पाप कम होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा दूर हो जाती है।

ध्वजा-स्तंभ: मंदिर की धुरी
मंदिर वास्तुकला में ध्वजा-स्तंभ गर्भगृह के सामने लगाया जाता है। यह मंदिर की आध्यात्मिक धुरी माना जाता है। यह सामान्यतः तांबे, पीतल या सोने से मढ़ा होता है, जिन्हें शुद्ध और शक्तिशाली धातु माना जाता है। इसकी स्थापना में कई दिनों तक विशेष मंत्रों और अग्नि-हवन से इसे पवित्र किया जाता है।

ध्वजा-रोहण: ऊर्जा और उत्सव की शुरुआत
मंदिर में किसी बड़े उत्सव या त्योहार की शुरुआत ध्वज चढ़ाने से होती है। ढोल-नगाड़ों और शंख के साथ ध्वज चढ़ाया जाता है, जिससे पूरे क्षेत्र में पवित्रता और उत्सव का वातावरण फैल जाता है।

व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृष्टि
ध्वज का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि व्यावहारिक भी था—प्राचीन समय में यात्री शहर का केंद्र पहचानने के लिए सबसे ऊंचे मंदिर के ध्वज को देखते थे, ध्वज की गति से हवा की दिशा और मौसम का अंदाज़ लगाया जाता था, और तांबे या धातु से बना ऊंचा ध्वजा-स्तंभ बिजली गिरने पर मंदिर को सुरक्षित रखता था, ठीक आधुनिक लाइटनिंग रॉड की तरह। जनवरी 2024 में अयोध्या के श्रीराम मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद धर्मध्वज का चढ़ना इसी परंपरा के पुनर्जागरण का प्रतीक बना—यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था, बल्कि पवित्र परंपरा की वापसी, सांस्कृतिक स्मृति के पुनर्जीवन और सदियों पुरानी आस्था की निरंतरता का संदेश देने वाला ऐतिहासिक क्षण था।

ध्वज क्यों महत्वपूर्ण है?
ध्वज इसलिए महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि वह तीन मूल अर्थों को अपने भीतर समेटे होता है—उपस्थिति, यानी मंदिर में देवता के सान्निध्य और जीवंतता का संकेत; सुरक्षा, यानी नकारात्मक शक्तियों और अनिष्ट से रक्षा का प्रतीक; और पहचान, यानी मंदिर की पवित्र सीमा, उसकी संस्कृति और आध्यात्मिक परंपरा का स्पष्ट चिन्ह। यह त्रि-आयामी महत्व ध्वज को सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि मंदिर की आत्मा का दृश्य रूप बना देता है।

धर्म का सीधा, स्थिर और उज्ज्वल प्रतीक
धर्मध्वज सिर्फ मंदिर की छत पर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक चेतना में भी सदियों से स्थापित है। वह हमें याद दिलाता है कि परंपराएँ तभी जीवित रहती हैं जब वे लगातार निभाई जाती हैं—शोर नहीं, बल्कि संयम और स्थिरता से।

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