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पाकिस्तान सिनेमा के जरिए भारत विरोधी नैरेटिव और खालिस्तानी एजेंडा को दे रहा बढ़ावा: रिपोर्ट

‘खालसा वॉक्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में यह देखा जा रहा है कि सिनेमा को लगातार भारत विरोधी गतिविधियों को तेज करने के लिए एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।

भारत विरोधी नैरेटिव और खालिस्तानी एजेंडा को बढ़ावा दे रहा पाक / IANS

एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान में सिनेमा का इस्तेमाल भारत विरोधी नैरेटिव को आगे बढ़ाने और खालिस्तानी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि इस तरह की रणनीतियां पवित्र धार्मिक स्थलों की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं, विरासत का राजनीतिकरण करती हैं और कला व धर्म को राज्य सत्ता के औजार में बदल देती हैं।

‘खालसा वॉक्स’ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान में यह देखा जा रहा है कि सिनेमा को लगातार भारत विरोधी गतिविधियों को तेज करने के लिए एक हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है, खासतौर पर खालिस्तान से जुड़ी गतिविधियों के लिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन लोगों को भारत में खालिस्तान समर्थक फिल्में या गाने बनाने में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, वे पाकिस्तान जाकर बिना किसी रोक-टोक के ऐसी गतिविधियां करते हैं और फिर उस कंटेंट को सोशल मीडिया के जरिए वायरल कर दिया जाता है।

रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि पाकिस्तान में इस तरह की प्रतिगामी सोच के चलते एक विरोधाभासी स्थिति पैदा हो गई है। एक तरफ पूरा भारत और भारतीय पंजाब तेज आर्थिक विकास, संस्थागत सुधारों और सामाजिक प्रगति के कारण वैश्विक स्तर पर ध्यान आकर्षित कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी पंजाब भ्रष्टाचार, घोटालों और लंबे समय से चली आ रही कुप्रशासन की समस्याओं में फंसा हुआ है।

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रिपोर्ट के मुताबिक, अपनी घरेलू विफलताओं से ध्यान हटाने के बजाय पाकिस्तान तेजी से भारत विरोधी नैरेटिव पर निर्भर होता जा रहा है। इसके लिए राज्य समर्थित मीडिया हाउस, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, यूट्यूबर और फिल्म निर्माताओं को सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिए जनमत को प्रभावित करने के लिए सक्रिय किया जा रहा है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सिनेमा का इस तरह इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है। दशकों से पाकिस्तानी फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में सिख पात्रों, खासकर सिख महिलाओं को बेहद संकीर्ण और विवादास्पद नजरिए से दिखाया जाता रहा है। कई प्रोडक्शन्स में इस्लामीकरण या तथाकथित ‘कन्वर्ज़न रोमांस’ जैसे ट्रॉप्स का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें कई सिख टिप्पणीकार अपमानजनक और वैचारिक रूप से पक्षपाती मानते हैं।

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि पवित्र सिख स्थलों, विशेषकर गुरु नानक देव जी की जन्मस्थली ननकाना साहिब में फिल्मांकन के फैसले को लेकर व्यापक आलोचना हुई है। सिख धार्मिक अधिकारियों ने इसे ‘बेअदबी’ करार दिया है और जोर देकर कहा है कि गुरुद्वारे केवल आध्यात्मिक साधना, निःस्वार्थ सेवा और गुरु ग्रंथ साहिब जी की भक्ति के लिए होते हैं। इन स्थलों का व्यावसायिक फिल्मांकन या राजनीतिक संदेशों के लिए इस्तेमाल किया जाना सिख धर्म के मूल सिद्धांतों का उल्लंघन माना जाता है।

रिपोर्ट के अनुसार, कई सिखों के लिए यह विवाद केवल भू-राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मिलीभगत जैसे गंभीर सवाल भी खड़े करता है। इसमें यह चिंता जताई गई है कि कुछ लोग—जो पैसे, प्रसिद्धि या संस्थागत संरक्षण से प्रेरित हैं—धार्मिक पवित्रता और सामुदायिक सम्मान से समझौता करने को तैयार दिखते हैं।

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