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यूके में तेजी से बढ़ रहा भारतीयों का प्रभाव, कई मामलों में अंग्रेजों से भी बेहतरः रिपोर्ट

रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन में रहने वाले भारतवंशी सामाजिक, आर्थिक और विकास संबंधी मानकों में अन्य सभी जातीय अल्पसंख्यकों से आगे हैं।

'ए पोर्ट्रेट ऑफ मॉडर्न ब्रिटेन: एथनिसिटी एंड रिलिजन' नाम की रिपोर्ट में जातीय आबादी के प्रभाव का आकलन किया गया है। / Image : unsplash/ Kristina Gadeikyte

ब्रिटेन के थिंक टैंक पॉलिसी एक्सचेंज की एक नई रिपोर्ट में यूके में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों के बढ़ते प्रभाव का आकलन किया गया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटेन में रहने वाले भारतवंशी सामाजिक, आर्थिक और विकास संबंधी मानकों में अन्य सभी जातीय अल्पसंख्यकों से आगे हैं। इतना ही नहीं, वे मूल स्थानीय श्वेत आबादी से भी बेहतर काम कर रहे हैं।

'ए पोर्ट्रेट ऑफ मॉडर्न ब्रिटेन: एथनिसिटी एंड रिलिजन' नाम की इस रिपोर्ट में ब्रिटेन में जातीय विविधता का विश्लेषण किया गया है। इसमें आधुनिक ब्रिटेन को आकार देने में अहम भूमिका निभा रहे भारतीय मूल के निवासियों के प्रमुख रुझानों को उजागर किया गया है।

यह रिपोर्ट 2021 की जनगणना और अन्य डेटा के आधार पर तैयार की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, इंग्लैंड और वेल्स में व्यापक एशियाई श्रेणी के निवासियों का प्रतिशत 2011 के 7.5 प्रतिशत से बढ़कर 2021 में 9.3 प्रतिशत हो गया है और अब ये 55 लाख तक पहुंच गया है। 

ब्रिटेन में सबसे बड़ा एशियाई जातीय समूह भारतीय है। इसकी आबादी कुल जनसंख्या का 2.5 प्रतिशत से बढ़कर 3.1 प्रतिशत हो गई है। एक दशक इनकी संख्या 19 लाख हो गई है। ईस्ट मिडलैंड्स के लीसेस्टर में भारतवंशियों की सबसे अधिक संख्या है। वहां की 34.3 प्रतिशत आबादी भारतीय है। इनमें हर छह में से एक भारत में पैदा हुआ है। 

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय घर के स्वामित्व, रोजगार और पेशेवर व्यवसाय आदि में भी सबसे आगे हैं। भारतीय मूल के लोगों में से 71 प्रतिशत अपने खुद के घर में रहते हैं। इसके अलावा 72 प्रतिशत ब्रिटिश भारतीय वर्किंग या अपने खुद के रोजगार से जुड़े हैं जो सभी जातीय समूहों में सबसे अधिक है।

भारतीय मूल के लगभग 40 प्रतिशत पेशेवर हैं। वहीं पाकिस्तानी बांग्लादेशियों का आंकड़ा सिर्फ 21.9 प्रतिशत है, जो ब्रिटेन में दक्षिण एशियाई समुदायों की सामाजिक, आर्थिक स्थिति में अंतर को दिखाता है। इतना ही नहीं भारतीय मूल के लोग कई मायनों जैसे कि पेशेवर व्यवसाय दर, औसत प्रति घंटा वेतन और घर के स्वामित्व आदि में श्वेत ब्रिटिश नागरिकों से बेहतर हैं। 

रिपोर्ट में ब्रिटेन की विदेश नीति डिबेट को आकार देने में जातीय एवं धार्मिक समुदायों की भूमिका का भी आकलन किया गया है। इसमें हिंदूज फॉर डेमोक्रेसी के 'हिंदू मैनिफेस्टो' का जिक्र किया गया है जिसमें भारत की संप्रभुता पर हमला करने वालों पर बैन लगाने का आह्वान किया गया था। 

रिपोर्ट बताती है कि सामान्य आबादी के 40 प्रतिशत लोगों में मजबूत 'ब्रिटिश भावना' है। हालांकि जातीय अल्पसंख्यकों में यह थोड़ी कम है। हालांकि भारतीय मूल के 33 प्रतिशत लोगों ने उच्च ब्रिटिश भावना जाहिर की। 
 

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