AAPI अध्यक्ष डॉ. अमित चक्रवर्ती। / Courtesy photo
अमेरिका में भारतीय मूल के डॉक्टरों के सबसे बड़े और सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक, 'अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडियन ओरिजिन' (AAPI) ने H-1B डॉक्टर वीजा आवेदनों के लिए प्रस्तावित $100,000 की फीस को रोकने वाले फेडरल कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। संगठन ने इस फैसले को मरीजों की देखभाल और अमेरिकी हेल्थकेयर सिस्टम की स्थिरता के लिए एक अहम जीत बताया है।
यह नियम मूल रूप से सितंबर 2025 में राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के एक आदेश से शुरू किया गया था। इसके तहत, अमेरिका के बाहर से आवेदन करने वाले कर्मचारियों के लिए नई H-1B याचिकाओं पर नियोक्ताओं (employers) को एक बार में $100,000 की फीस देनी पड़ती। AAPI के नेताओं ने जोर देकर कहा कि इस वित्तीय बोझ का सबसे ज्यादा असर ग्रामीण अस्पतालों, 'सेफ्टी-नेट' संस्थानों और उन जगहों पर पड़ता जहां हेल्थकेयर सुविधाएं कम हैं, और जहां इंटरनेशनल मेडिकल ग्रेजुएट्स (IMGs) अहम भूमिका निभाते हैं।
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AAPI के नेताओं का कहना है कि प्रस्तावित $100,000 की H-1B वीजा शर्त को रोकने का कोर्ट का फ़ैसला हेल्थकेयर तक पहुंच और वर्कफोर्स की स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक अहम कदम है। IMGs के लिए एक बड़ी बाधा को हटाकर, यह फैसला लाखों मरीजों- खासकर उन समुदायों में जहां सुविधाएं कम हैं- के लिए इलाज जारी रखने में मदद करता है।
एक आधिकारिक बयान में, AAPI के प्रेसिडेंट डॉ. अमित चक्रवर्ती ने देश भर के डॉक्टरों और मरीजों, दोनों के लिए इस फैसले के महत्व पर जोर दिया।
डॉ. चक्रवर्ती ने कहा कि यह फैसला उस सिस्टम में निष्पक्षता और स्थिरता लाता है जिस पर हज़ारों विदेशी डॉक्टर निर्भर हैं। यह कोई राजनीतिक जीत नहीं है। यह हेल्थकेयर की जीत है। यह सुनिश्चित करता है कि क्लिनिकल जरूरतों से असंबंधित पॉलिसी बाधाओं के कारण मरीजों को जोखिम में न डाला जाए।
AAPI निष्पक्ष, पारदर्शी और मरीज-केंद्रित इमिग्रेशन नीतियों की वकालत करने के लिए प्रतिबद्ध रहा है। संगठन ने अब फिर से कहा है कि वह डॉक्टरों का एक मजबूत और टिकाऊ वर्कफोर्स सुनिश्चित करने के लिए फेडरल एजेंसियों, मेडिकल संगठनों और सामुदायिक सहयोगियों के साथ काम करना जारी रखेगा।
AAPI ने बताया था कि H-1B वीजा पर डॉक्टरों के नए आवेदनों पर $100,000 की फीस से अस्पताल नौकरी के ऑफर वापस ले सकते थे, जिससे अहम पद खाली रह जाते और पहले से ही कमजोर इलाकों में इलाज तक पहुंच काफी कम हो जाती।
डॉ. चक्रवर्ती ने समझाया कि कई अस्पतालों के लिए इतना बड़ा वित्तीय बोझ उठाना मुश्किल होता। इसके नतीजे तुरंत सामने आते- डॉक्टरों की कमी, इंतजार का लंबा समय और उन समुदायों के लिए इलाज तक पहुंच कम हो जाती जो पहले से ही स्वास्थ्य सेवाओं में असमानता का सामना कर रहे हैं।
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