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अमेरिका की चेतावनी के बीच फिर संकट में भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट, आगे की राह कठिन

नई दिल्ली ने वाशिंगटन के साथ प्रतिबंधों और व्यापार वार्ताओं पर संवाद जारी रखा है, जिससे फिलहाल भारत को दंडात्मक अमेरिकी कार्रवाई से राहत मिली हुई है।

 भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट भारत का चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट / IANS File Photo

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया चेतावनी—कि ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगाया जा सकता है—का सीधा असर भारत पर पड़ सकता है। इसके साथ ही, भारत के लिए रणनीतिक रूप से अहम चाबहार बंदरगाह परियोजना भी एक बार फिर मुश्किल दौर में फंसती नजर आ रही है।

भारत ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। चीन, तुर्की, यूएई, पाकिस्तान और आर्मेनिया भी ईरान के बड़े कारोबारी सहयोगी हैं। अमेरिका द्वारा प्रस्तावित नया टैरिफ पहले से लागू 25 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क और रूस से तेल खरीदने पर लगाए गए दंडात्मक शुल्क के अतिरिक्त होगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते रूसी तेल पर पश्चिमी प्रतिबंध लागू हैं, जिसके कारण यह अतिरिक्त दबाव बना है।

ऐसे में चाबहार पोर्ट के संचालन पर किसी भी तरह का असर भारत के लिए रणनीतिक जोखिम पैदा कर सकता है। यह परियोजना पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट के जवाब में भारत की अहम पहल है, जिसे चीन के सहयोग से विकसित किया गया है।

यह भी पढ़ें- ईरान से व्यापार पर अमेरिका लगाएगा 25 प्रतिशत टैरिफ, क्या भारत पर पड़ेगा असर

भारत और ईरान ने मई 2024 में शाहिद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास के लिए 10 साल का समझौता किया था। हालांकि, अमेरिका के विदेश मंत्री ने 2018 में ईरान फ्रीडम एंड काउंटर-प्रोलिफरेशन एक्ट (IFCA) के तहत दी गई प्रतिबंध छूट को सितंबर 2025 से रद्द कर दिया। भारत को फिलहाल अप्रैल 2026 तक सीमित छूट मिली हुई है, जिससे वह अस्थायी रूप से परियोजना का संचालन और विकास जारी रख सकता है।

इस बीच, नई दिल्ली ने वाशिंगटन के साथ प्रतिबंधों और व्यापार वार्ताओं पर संवाद जारी रखा है, जिससे फिलहाल भारत को दंडात्मक अमेरिकी कार्रवाई से राहत मिली हुई है।

चाबहार पोर्ट भारत के लिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच का अहम रास्ता है, जो पाकिस्तान को बाइपास करता है। ऐसे समय में इस छूट को भारत की एक कूटनीतिक सफलता माना गया था, खासकर तब जब ईरान और रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर वैश्विक तनाव बना हुआ है।

हालांकि, भारत के 500 मिलियन डॉलर के निवेश और 10 साल के संचालन समझौते पर अब भी सेकेंडरी सैंक्शन्स का खतरा मंडरा रहा है। इससे अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिए व्यापारिक मार्ग जटिल हो सकते हैं।

अमेरिकी कांग्रेस की अगस्त 2025 की एक रिपोर्ट के अनुसार, ईरान पर लगाए गए प्रतिबंधों का उद्देश्य 1979 की क्रांति के बाद से तेहरान के “विरोधी व्यवहार को रोकना और उसमें बदलाव लाना” रहा है। रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि अप्रैल 2024 में इजरायल पर ईरान के सीधे हमले के बाद अमेरिका ने ईरान से जुड़े बंदरगाह ऑपरेटरों और तेल रिफाइनरियों पर सख्त प्रतिबंधों का प्रावधान किया।

यदि व्हाइट हाउस अब इन शक्तियों का सख्ती से इस्तेमाल करता है, तो चाबहार से जुड़ी भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजारों में प्रतिबंध, फाइनेंसिंग और बीमा से जुड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। वैश्विक बैंक और बीमा कंपनियां भी इस परियोजना से दूरी बना सकती हैं, जिससे पोर्ट संचालन धीमा पड़ने की आशंका है।

इसके अलावा, पाकिस्तान के साथ सीमा तनाव के चलते अफगानिस्तान के लिए चाबहार के जरिए समुद्री व्यापार एक महत्वपूर्ण विकल्प है। यदि इसमें बाधा आती है, तो मानवीय आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है।

भारत के लिए अतिरिक्त प्रतिबंध और टैरिफ अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ताओं को और जटिल बना सकते हैं। अप्रैल 2026 तक मिली मौजूदा छूट ने भारत को कुछ समय जरूर दिया है, जिसका इस्तेमाल नई दिल्ली क्षेत्रीय सहयोग और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने में करना चाहती है—जो मध्य एशिया और उससे आगे भारत की आर्थिक व भू-राजनीतिक रणनीति के लिए बेहद अहम है।

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