ग्लोबल कश्मीर पंडित डायस्पोरा के सदस्यों ने शनिवार, 12 मार्च, 2022 को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर कश्मीरी हिंदुओं के पलायन के पीड़ितों के लिए न्याय की मांग करते हुए विरोध प्रदर्शन किया। / Wasim Sarvar/IANS
36 साल तक शीरिन रैना के लिए कश्मीर सिर्फ टुकड़ों में बसी यादों जैसा था। न्यू जर्सी में खाने की मेज पर सुनी गई कहानियां, पुरानी पड़ चुकी तस्वीरें, मंदिरों के नाम और माता-पिता की वे यादें, जो एक रात अचानक कश्मीर छोड़कर चले गए थे और फिर कभी वास्तव में लौट नहीं पाए।
अब 21 साल की शीरिन पहली बार कश्मीर जाने की तैयारी कर रही हैं। आईएएनएस के साथ एक विशेष वेबिनार बातचीत में अमेरिका में रहने वाले कश्मीरी पंडित समुदाय के नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नई पीढ़ी के युवाओं ने बताया कि जून में होने वाली उनकी कश्मीर यात्रा सिर्फ घूमने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और पहचान को बचाए रखने की कोशिश भी है।
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शीरिन रैना ने कहा, “जब मैं सातवीं कक्षा में थी, तभी से मैं अपने पिता से पूछती थी कि हम कश्मीर कब वापस जाएंगे। उस समय मुझे समझ नहीं था कि यह सवाल कितना गहरा और भावनात्मक है।”
जून में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई कश्मीरी पंडित एक साथ कश्मीर जाने वाले हैं। आयोजक इसे “हेरिटेज टूर” और “अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन” बता रहे हैं। इसका उद्देश्य सिर्फ पुराने स्थानों को देखना नहीं, बल्कि बिखरे हुए कश्मीरी पंडित समुदाय को अपनी जड़ों और मातृभूमि से फिर जोड़ना है, जिसे कई लोग अब धीरे-धीरे सिर्फ यादों में सिमटता हुआ मानते हैं।
पुरानी पीढ़ी के लिए यह यात्रा अपने घर से बेघर होने के दर्द से जुड़ी है, जबकि युवा पीढ़ी के लिए यह अपनी पहचान को समझने की कोशिश है।
न्यू जर्सी में रहने वाले लेखक और समुदाय के नेता राकेश कौल ने कहा, “कश्मीर से यह हमारा सातवां पलायन था। लेकिन 1989-90 में हुए नरसंहार और जातीय सफाए के बाद पहली बार हम इतनी बड़ी संख्या में औपचारिक रूप से वापस जा रहे हैं। यह सिर्फ यात्रा नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को उनकी विरासत सौंपने जैसा है, जो कश्मीर से दूर रहकर बड़ी हुई है।"
राकेश कौल ने कहा, “हम अपने बच्चों को एक अनमोल तोहफा दे रहे हैं। जिस कश्मीर के बारे में उन्होंने अपने दादा-दादी से दर्दभरी कहानियां सुनी हैं, उसी कश्मीर में उनकी अपनी विरासत और पहचान भी बसती है।”
6 जून से 14 जून तक होने वाली इस यात्रा में कश्मीर के मंदिरों, ऐतिहासिक स्थलों और पैतृक जगहों का दौरा किया जाएगा। इसके बाद “निर्वासन से उत्कृष्टता की ओर: कश्मीरी पंडितों की सहनशीलता, पुनर्जागरण और वापसी की यात्रा” विषय पर एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित होगा।
ह्यूस्टन में रहने वाले डॉक्टर और ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा (जीकेपीडी) के सह-संस्थापक डॉ. सुरिंदर कौल ने कहा कि यह प्रयास भावनात्मक होने के साथ-साथ बहुत जरूरी भी है।
उन्होंने कहा, “हमारे समुदाय के सामने सबसे बड़ा खतरा धीरे-धीरे खत्म हो जाने का है। हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि हमारे लोग, हमारे बच्चे और युवा अपनी संस्कृति और पहचान से जुड़े रहें।”
उन्होंने बताया कि 1989-90 में आतंकवाद के कारण हुए पलायन के बाद समुदाय के लगभग 90 प्रतिशत लोग दोबारा कश्मीर नहीं जा सके। डॉ. कौल ने कहा, “हम वहां पीड़ित बनकर नहीं जा रहे हैं। हम एक मजबूत और संघर्षशील समुदाय के रूप में लौट रहे हैं।”
पूरी दुनिया में फैले इस समुदाय के आयोजकों का कहना है कि यह कोशिश अब एक सामूहिक प्रयास बन गई है, जिसका मकसद उन यादों को संजोकर रखना है, जो समय के साथ धुंधली होती जा रही हैं। जीकेपीडी की न्यू जर्सी में रहने वाली इंटरनेशनल कोऑर्डिनेटर निर्जा कौल साधू इस पहल को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
कई लोगों ने राजनीति के बारे में कम और अपनी विरासत के बारे में ज़्यादा बात की है, जैसे- जब कोई पूरी पीढ़ी अपने वतन को सिर्फ़ दुख भरी यादों के ज़रिए ही जानती है, तो उसका क्या होता है।
ह्यूस्टन में आईटी प्रोफेशनल अमित रैना ने बचपन में ही कश्मीर छोड़ दिया था। उनके लिए "कश्मीर से जुड़ाव अब ज़्यादातर बचपन की यादों तक ही सीमित है।" वे कहते हैं, "मेरे घर की यादें, हमारे मंदिरों की यादें और कई ऐसी यादें धीरे-धीरे धुंधली होती जा रही हैं। फिर भी समुदाय डर के मारे चुपचाप बैठा नहीं रह सकता। हम अपने वतन वापस जाना चाहते हैं। पर्यटक और अजनबी बनकर नहीं, बल्कि उस धरती के असली बेटे-बेटी बनकर।"
कुछ लोगों के लिए, यह वापसी एक बहुत ही निजी अनुभव है। जीकेपीडी यूएस की ह्यूस्टन में रहने वाली कोऑर्डिनेटर सुनीता टिकू भान कहती हैं, "इसका मतलब है, वापस जाकर अपनी मां से मिलना। आप अपनी माँ से दूर हैं, और आप वापस जाकर उन्हें गले लगाना चाहते हैं, उन्हें प्यार करना चाहते हैं, और उनसे कहना चाहते हैं, 'माँ, मुझे इतने सालों तक तुम्हारी बहुत याद आई।"
इस चर्चा में शामिल होते हुए, रोमेल भान ने उस भावनात्मक जुड़ाव के बारे में बात की, जो उन्हें अपनी धरती से जोड़ता है। उन्होंने बार-बार यह बात दोहराई कि यह सफर उनके बच्चों के लिए भी उतना ही जरूरी है, जितना कि खुद उनके लिए। न्यू जर्सी में रहने वाले आईटी प्रोफेशनल विनोद रैना कश्मीरी ओवरसीज एसोसिएशन से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि वे चाहते हैं कि नई पीढ़ी अपने पुश्तैनी मंदिरों और ऐतिहासिक जगहों को सिर्फ़ घर पर कहानियों में सुनने के बजाय खुद जाकर देखे।
कैलिफोर्निया में कश्मीरी ओवरसीज एसोसिएशन के प्रेसिडेंट उपहार कोटरू ने कहा, "हमारे बच्चों को यह जानने का हक है कि उनकी जड़ें कहां हैं। कश्मीर सिर्फ़ एक कहानी नहीं है जो मैं अपने बच्चों को सुनाता रहा हूं। यह एक ऐसी जगह है जिसे वे जानते हैं।"
वहीं, शीरीन रैना जैसे युवा सदस्यों के लिए, घाटी स्वर्ग और घाव दोनों के तौर पर मौजूद है। उन्होंने कहा, "इसे धरती पर स्वर्ग के तौर पर जाना जाता है, लेकिन वहां बहुत अंधेरा भी है। लेकिन चीजें जारी रहनी चाहिए। बड़ी बात यह है कि आगे से सिर्फ हम ही अपनी कहानी को कंट्रोल कर सकते हैं। कोई और हमारे लिए यह नहीं करेगा।"
बता दें कि 1989 और 1990 में घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन आधुनिक भारतीय इतिहास के सबसे दर्दनाक और राजनीतिक रूप से विवादित अध्यायों में से एक है। बढ़ते उग्रवाद, हत्याओं और धमकियों के बीच हजारों कश्मीरी हिंदू अपने घर छोड़कर भाग गए और आखिरकार पूरे भारत और दुनिया में फैल गए।
हाल के सालों में, समुदाय के विस्थापन के बारे में फिर से सार्वजनिक तौर पर चर्चा हुई है, जिसमें कार्यकर्ताओं, डॉक्यूमेंट्री और 'द कश्मीर फाइल्स' जैसी फिल्मों ने और बढ़ाया है। फिर भी, कई बेघर परिवारों के लिए, मुख्य सवाल अभी भी अनसुलझा है: क्या वापसी अभी भी संभव है, और लगभग चार दशकों के बाद "घर" का क्या मतलब है।
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