सांकेतिक / unsplash.com
अगस्त और दिसंबर 2025 के बीच कॉटन (कपास) के आयात पर भारत की अस्थायी ड्यूटी छूट से घरेलू टेक्सटाइल इंडस्ट्री को कुछ समय के लिए अच्छी-खासी राहत मिली है। जैसा कि नीचे चित्र में दिखाया गया है, 2025 के मध्य तक कॉटन का आयात सामान्य रहा, लेकिन अगस्त में छूट लागू होने के बाद इसमें तेजी से बढ़ोतरी हुई।
आयात अगस्त 2025 में 62.9 हजार टन से बढ़कर दिसंबर 2025 में 258.7 हजार टन के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया, जिससे पता चलता है कि आयातकों ने घरेलू सप्लाई बढ़ाने के लिए ड्यूटी-फ्री सुविधा का भरपूर लाभ उठाया। जब दिसंबर में छूट खत्म हो गई और जनवरी 2026 से 11.064 प्रतिशत की आयात ड्यूटी फिर से लागू हो गई, तो आयात तेजी से गिरकर जनवरी 2026 में 75.2 हज़ार टन और फरवरी में 17.1 हजार टन रह गया, जो आयात की मात्रा पर टैरिफ पॉलिसी के सीधे असर को दिखाता है।
साथ ही शंकर-6 बेंचमार्क के आधार पर मापी जाने वाली घरेलू कॉटन की कीमतें भी छूट की अवधि के दौरान कम हुईं। अगस्त 2025 में कीमतें लगभग 83 सेंट प्रति पाउंड थीं, जो धीरे-धीरे घटकर दिसंबर 2025 तक 74.3 सेंट प्रति पाउंड हो गईं। इससे पता चलता है कि आयातित कॉटन की बढ़ी हुई मात्रा ने सप्लाई की कमी के दबाव को कम करने और घरेलू बाजार में कीमतों को स्थिर करने में मदद की।
Infographics / Courtesy photoहालांकि, ड्यूटी छूट खत्म होने के बाद कीमतें फिर से बढ़ने लगीं और मई 2026 तक 86.6 सेंट प्रति पाउंड तक पहुंच गईं। कुल मिलाकर, आयात और कीमतों के रुझान बताते हैं कि छूट ने सप्लाई की कमी को दूर करने और बाजार की कीमतों को स्थिर करने के लिए एक असरदार अस्थायी उपाय के तौर पर काम किया।
लेकिन टैरिफ में छूट असल में एक अल्पकालिक उपाय है। असली और गहरी चुनौती भारत में कॉटन की उत्पादकता (productivity) से जुड़ी है। दुनिया में कॉटन का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता होने- और वैश्विक कॉटन उत्पादन और खपत का लगभग पांचवां हिस्सा होने- के बावजूद, भारत में कॉटन की औसत पैदावार लगभग 440 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है, जो वैश्विक औसत (लगभग 840 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) से काफी कम है।
इसकी तुलना में, चीन की पैदावार 2,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से अधिक है। इसका मतलब है कि भारत में बड़े पैमाने पर उत्पादन मुख्य रूप से खेती के बड़े रकबे (acreage) की वजह से होता है, न कि उत्पादकता की वजह से। इसलिए, कॉटन-टेक्सटाइल वैल्यू चेन में लगातार कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए समय-समय पर इम्पोर्ट-ड्यूटी में राहत देने से कहीं ज्यादा की जरूरत होगी। इसका लॉन्ग-टर्म समाधान बेहतर बीज टेक्नोलॉजी, मौसम के हिसाब से ढलने वाली किस्मों, सिंचाई की बेहतर क्षमता, मशीनीकरण और मजबूत एग्रीकल्चरल R&D के जरिए खेती की प्रोडक्टिविटी बढ़ाने में है। अगर इन स्ट्रक्चरल रुकावटों को दूर नहीं किया गया, तो कॉटन वैल्यू चेन में सप्लाई में रुकावट और कीमतों में उतार-चढ़ाव बार-बार हो सकते हैं, जिससे इंडस्ट्री और लोगों की आजीविका, दोनों पर असर पड़ेगा।
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