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आशा भोसले (1933–2026), एक अमर आवाज

आशा जी की सबसे बड़ी विशेषता थी समय के साथ खुद को ढालना।

आशा भोसले / Asha Bhosle

संगीत की दुनिया आज थोड़ी और शांत हो गई है क्योंकि अतुलनीय गायिका, पद्म विभूषण आशा भोसले (1933–2026) हमें उनकी संगीत विरासत के साथ छोड़ गई हैं। आशा जी को केवल एक पार्श्व गायिका कहना उनके योगदान की विशालता को कम करके आंकना होगा। वह एक ऐसी स्वर-रसायनज्ञ थीं जिन्होंने साधारण भावनाओं को दिव्य अभिव्यक्ति में बदल दिया।

उनकी यात्रा 1940 के दशक में शुरू हुई। उन्होंने मराठी फिल्म ‘माझा बाल’ (1943) में 'चला चला नव बाला' से शुरुआत की और 1948 में हिंदी में पदार्पण किया। उनकी बहन महान गायिका लता मंगेशकर ने भी इसी दौर में शुरुआत की। कई दशकों तक इन दोनों बहनों की आवाज ने हिंदी सिनेमा को अमर गीत दिए और अनगिनत यादें बनाई।

संगीतकार सचिन देव बर्मन के साथ आशा जी ने 'अभी न जाओ छोड़ कर' (हम दोनों, 1961) जैसा अमर गीत दिया जिसमें मोहम्मद रफी के साथ उनकी जुगलबंदी भावनात्मक सौंदर्य का उत्कृष्ट उदाहरण है। ओपी नैय्यर के साथ उनकी जोड़ी ने एक नया संगीत दौर शुरू किया। 'जाइये आप कहां जाएंगे' (मेरे सनम, 1965) और 'दीवाना हुआ बादल' (कश्मीर की कली, 1964) जैसे गीतों में उनकी चंचल और ऊर्जावान आवाज उनकी पहचान बन गई। सलील चौधरी के साथ उन्होंने 'बाग में कली खिली' (चांद और सूरज, 1965) जैसे जटिल गीतों को भी सहजता से निभाया। बाद में 'जानेमन जानेमन तेरे दो नैन' (छोटी सी बात, 1975) जैसे गीतों में भी उनकी बहुमुखी प्रतिभा दिखी।

लेकिन असली बदलाव तब आया जब उन्होंने राहुल देव बर्मन के साथ काम किया। 'दम मारो दम' (हरे रामा हरे कृष्णा, 1971) और 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां, 1971) ने नई पीढ़ी की आवाज को परिभाषित किया। वहीं 'बेचारा दिल क्या करे' (खुशबू, 1975) में उनकी भावनात्मक गहराई झलकती है। उन्होंने सीमाओं के पार भी काम किया और इलैयाराजा के साथ तमिल फिल्मों में 'शेनबगमे' (1987) जैसे गीत गाए।

आशा जी की सबसे बड़ी विशेषता थी समय के साथ खुद को ढालना। एआर रहमान के साथ 'तन्हा तन्हा' (रंगीला, 1995) में उनकी आवाज ने नई ऊर्जा दिखाई। 'राधा कैसे न जले' (लगान, 2001) में उन्होंने ईर्ष्या जैसे जटिल भाव को भी शानदार तरीके से व्यक्त किया। खय्याम के साथ 'दिल चीज क्या है' और 'इन आंखों की मस्ती' (उमराव जान, 1981) जैसे गजलों में उनकी शास्त्रीय सुंदरता देखने को मिली।

किशोर कुमार के साथ उनके गीत, खासकर 'जवानी दीवानी', 'यादों की बारात', 'हमशक्ल' और 'खेल खेल में' जैसी फिल्मों में आज भी गायन की बेहतरीन मिसाल माने जाते हैं। जब हम उनके सफर को याद करते हैं तो समझ आता है कि ऐसी आवाजें बहुत दुर्लभ होती हैं। उनकी भौतिक आवाज भले अब शांत हो गई हो लेकिन उनके गीत आज भी संगीत सीखने वालों के लिए मार्गदर्शक हैं और हर श्रोता के दिल को रोशन करते हैं।

लेखक एक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध संगीतकार और कंपोजर हैं जो अमेरिका में रहते हैं और दशकों के अनुभव पर आधारित काम करते हैं। वह ‘अनुभूति - एक्सपीरियंसिंग मुथुस्वामी दीक्षितर’ पुस्तक के लेखक हैं जो दीक्षितर के 250वें वर्ष पर प्रकाशित पहली पुस्तक है। 

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