Ajay Kela / Handout
आज जब पूरी दुनिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर नौकरियां खत्म होने का डर बढ़ रहा है वहीं वाधवानी फाउंडेशन AI का इस्तेमाल रोजगार पैदा करने, लोगों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने और समाजसेवा के लिए कर रहा है। साल 2000 में सिलिकॉन वैली के मशहूर उद्यमी डॉ. रोमेश वाधवानी ने इस फाउंडेशन की शुरुआत की थी। उनका मकसद था उभरती अर्थव्यवस्थाओं की सबसे बड़ी चुनौती यानी बड़े स्तर पर नौकरियां पैदा करना और लोगों को उन नौकरियों के लिए तैयार करना।
फाउंडेशन का मानना है कि रोजगार की समस्या सिर्फ अलग-अलग योजनाओं से हल नहीं हो सकती। इसलिए यह बिजनेस को बढ़ाकर रोजगार पैदा करना, युवाओं को नई स्किल्स देना और योग्य लोगों को सही अवसरों से जोड़ना जैसे पूरा सिस्टम बनाने पर काम करता है।
फाउंडेशन के सीईओ और बोर्ड सदस्य अजय केला ने कहा कि AI उनके संगठन की पहचान का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि AI हमारे डीएनए में है। रोमेश वाधवानी ने 1970 के दशक में अपनी पहली कंपनी रोबोटिक्स और AI के क्षेत्र में शुरू की थी। उस समय तकनीक इतनी विकसित नहीं थी, लेकिन उन्होंने करीब दस साल उस पर काम किया।
ChatGPT के आने से काफी पहले साल 2018 में वाधवानी इंस्टीट्यूट फॉर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की स्थापना की गई थी। इसका उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। अजय केला ने बताया कि उनका संगठन सिर्फ दान देने तक सीमित नहीं है।
उन्होंने कहा कि हम खुद समस्याओं की पहचान करते हैं और उनके समाधान तैयार करते हैं। टेक्नोलॉजी और AI बड़े स्तर पर असर डालने के सबसे मजबूत साधन हैं। फाउंडेशन ने छात्रों के लिए AI आधारित ट्यूटर भी बनाया है। यह कई भारतीय भाषाओं में पढ़ा सकता है और हर छात्र की जरूरत के हिसाब से मदद करता है।
केला ने कहा कि लगभग हर परिवार अपने बच्चों के लिए ट्यूटर रखना चाहता है। हमारा AI ट्यूटर इंटरनेट की सामूहिक जानकारी रखता है, बच्चों की भाषा बोलता है और 24 घंटे उपलब्ध रहता है। उन्होंने कहा कि पहले तकनीक सिर्फ बड़े स्तर पर काम करने में मदद करती थी, लेकिन अब AI गुणवत्ता के साथ बड़े स्तर पर सेवाएं देने में सक्षम बना रहा है।
वाधवानी फाउंडेशन भारतीय-अमेरिकी उद्यमियों की शुरुआती बड़ी समाजसेवी पहलों में से एक माना जाता है। इसका उद्देश्य है परिवारों को सम्मानजनक जीवन देना, ताकि कम से कम परिवार का एक सदस्य अच्छी नौकरी और बेहतर आय हासिल कर सके।
अजय केला ने कहा कि जब परिवार की आय स्थिर होती है, तब वे सिर्फ खाने और रहने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि अपने बच्चों की पढ़ाई और भविष्य में निवेश कर पाते हैं। इससे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियां बदल सकती हैं। फाउंडेशन स्टार्टअप्स, छोटे व्यवसायों और युवाओं के साथ मिलकर काम करता है ताकि ज्यादा से ज्यादा रोजगार पैदा किए जा सकें।
केला ने बताया कि भारत में कई स्टार्टअप शुरुआत में ही बंद हो जाते हैं। ऐसे में उनका लक्ष्य ज्यादा स्टार्टअप्स को टिकाऊ बनाना है ताकि वे आगे रोजगार दे सकें। उन्होंने कहा कि हम एक तरफ नौकरियां पैदा करने में मदद करते हैं और दूसरी तरफ कमजोर वर्गों को उन नौकरियों तक पहुंचाने का काम करते हैं।
डॉ. रोमेश वाधवानी ने कार्नेगी मेलन यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने के बाद कई सफल कंपनियां खड़ी कीं। करीब दो दशक पहले उनकी एक कंपनी 10 अरब डॉलर में बिकी थी, जिसके बाद उन्होंने इस फाउंडेशन की शुरुआत की। अजय केला ने कहा कि हमने सिर्फ उनकी संपत्ति का इस्तेमाल नहीं किया, बल्कि कंपनियां बनाने और रोजगार पैदा करने के अनुभव को भी समाज के लिए इस्तेमाल किया।
उन्होंने कहा कि भारतीय प्रवासी समुदाय ने सिर्फ संपत्ति नहीं बनाई, बल्कि संस्थाएं, नेटवर्क और मजबूत सिस्टम भी बनाए हैं। अब कई भारतीय मूल के लोग अपनी संपत्ति और अनुभव का इस्तेमाल समाज में बदलाव लाने के लिए कर रहे हैं।
आपको बताएं कि मुंबई में पले-बढ़े अजय केला IIT से पढ़ाई के बाद छात्रवृत्ति पर अमेरिका गए थे। बाद में भारत लौटे और फिर रोमेश वाधवानी के साथ जुड़ गए।
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