सांकेतिक तस्वीर / Generated using AI
मैं हैदराबाद के एक मिडिल-क्लास परिवार में पला-बढ़ा, जहां माना जाता था कि शिक्षा ही सबसे बड़ा तोहफा है जो माता-पिता अपने बच्चों को दे सकते हैं। हमारे पास अधिक कुछ नहीं था, लेकिन किताबें, कुछ नया जानने की उत्सुकता और यह शांत भरोसा था कि कड़ी मेहनत और ईमानदारी से आगे चलकर मौके जरूर मिलेंगे।
अमेरिका ने इन मूल्यों को पनपने का मौका दिया। जब मैं अमेरिका पहुंचा, तो मैं कोई और नहीं बनना चाहता था। मैं बस खुद का सबसे बेहतर रूप बनना चाहता था। अमेरिका ने इसे मुमकिन कर दिखाया।
पच्चीस सालों तक, माइक्रोसॉफ्ट एक ऐसी जगह रही जहां हैदराबाद से आए एक प्रवासी के तौर पर मैंने बिना किसी सीमा के सपने देखे। मैंने दुनिया भर के शानदार साथियों के साथ काम किया, बेहतरीन लीडर्स से सीखा और ऐसे प्लेटफॉर्म और ऑर्गनाइजेशन बनाने का मौका पाया जिनसे लाखों लोगों की जिंदगी पर असर पड़ा। मैंने महसूस किया कि इनोवेशन तब फलता-फूलता है जब अलग-अलग नजरिए एक साथ आते हैं।
अमेरिका ने मुझे ऐसे मौके दिए जिनकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी। फिर उसने मुझे कुछ ऐसा दिया जो उससे कहीं ज्यादा कीमती था। जब मैं चालीस के दशक में था, तो मेरा दिल काम करना बंद करने लगा।
जो कैलेंडर कभी प्रोडक्ट रिव्यू और स्ट्रैटेजी मीटिंग्स से भरा रहता था, वह अचानक अस्पताल के चक्करों, मेडिकल प्रोसीजर और अनिश्चितता से भर गया। अठारह महीनों तक, एक मैकेनिकल हार्ट पंप ने मुझे जिंदा रखा, जबकि मैं डोनर हार्ट का इंतजार कर रहा था।
जनवरी की एक सुबह, मुझे जिंदगी का दूसरा मौका मिला। एक परिवार ने, जिससे मैं कभी नहीं मिलूंगा, एक बहुत बड़े दुख के बीच निस्वार्थ फैसला लिया। कुशल सर्जनों, दयालु नर्सों, रिसर्चर्स और देखभाल करने वालों ने उस तोहफे को उन सालों में बदल दिया जिनकी मुझे कभी उम्मीद नहीं थी। उसके बाद का हर आम दिन और रोजमर्रा की आदतें - जैसे सुबह की सैर, पत्नी के साथ डिनर, दोस्त से बातचीत - इस बात की याद दिलाती हैं कि जिंदगी ही सबसे बड़ा मौका है। उस अनुभव ने मुझे बदल दिया।
इस साल की शुरुआत में, मैंने ‘हैदराबाद डेज: द कोड वी लिव्ड बाय बिफोर वी कोडेड’ (Hyderabad Days, The code we lived by before we coded) नाम की किताब पब्लिश की, जो 80 और 90 के दशक के भारत में मेरे बड़े होने के दिनों की यादों पर आधारित है।
दोस्तों को यह बात मजेदार लगी। माइक्रोसॉफ्ट में पच्चीस साल बिताकर डेटा प्लेटफॉर्म बनाने, इंजीनियरिंग टीमों को लीड करने और AI के भविष्य को आकार देने में मदद करने के बाद, धूल भरी गलियों में क्रिकेट खेलने, रविवार को रिश्तेदारों के घर जाने, ईरानी कैफे और एक ऐसे शहर के बारे में क्यों लिखना जो आज ज्यादातर यादों में ही बसा है?
इसका जवाब आसान है: मैं जितना दूर गया, मुझे उतनी ही अधिक उस जगह की अहमियत समझ आई जहां से मैंने शुरुआत की थी।
मुझे आज भी टेक्नोलॉजी और उससे बनने वाली अनगिनत संभावनाओं से प्यार है, लेकिन मेरा मानना है कि हम जो सबसे जरूरी चीजें बनाते हैं, वे प्रोडक्ट्स नहीं, बल्कि लोग और कम्युनिटीज हैं। इसी सोच की वजह से मैं युवा लीडर्स को मेंटर करता हूं, ट्रांसप्लांट मरीजों से बात करता हूं और किताबें लिखता हूं। ‘हैदराबाद डेज’ उन यादों को संजोने और उस जगह का सम्मान करने का मेरा तरीका है जिसने मुझे मेरे शुरुआती सपने दिए।
लोग कभी-कभी पूछते हैं कि मैं ज्यादा भारतीय महसूस करता हूं या ज्यादा अमेरिकी। मुझे कभी समझ नहीं आता कि क्या जवाब दूं, क्योंकि मुझे कभी इनमें से किसी एक को चुनने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
भारत मेरे मूल्यों, मेरे परिवार, मेरी भाषा और मेरे द्वारा सुनाई जाने वाली कहानियों में बसता है। अमेरिका उन मौकों, दोस्ती, करियर और उस जिंदगी में बसता है जो सचमुच बचाई गई थी।
आज, दुनिया जब AI शब्द सुनती है, तो उसे ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) का ख्याल आता है। लेकिन मेरे मन में कुछ और आता है।मेरा सफर हमेशा AI से ही आकार लेता रहा है। A का मतलब अमेरिका है। I का मतलब इंडिया (भारत) है।
भारत ने मुझे जड़ें दीं। अमेरिका ने मुझे उड़ान भरने के लिए पंख दिए। एक ने मुझे सिखाया कि मैं कहां से आया हूं। दूसरे ने मुझे दिखाया कि मैं कितनी दूर जा सकता हूं।
मैंने जो कुछ भी बनाया है, जो भी कहानी लिखी है, और समाज को वापस देने की जो भी कोशिश की है, वह सब इन्हीं दोनों से उपजा है। और इसके लिए मैं हमेशा आभारी रहूंगा।
लेखक पिछले 25 सालों से माइक्रोसॉफ्ट में CVP हैं
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