भारत और अमेरिकी ध्वज / Courtesy Photo
मध्य-2020 के दशक की तमाम उथल-पुथल के बाद 2026 कोई बड़े नाटकीय बदलाव का नहीं, बल्कि सूक्ष्म लेकिन अहम पुनर्संतुलन (रीकैलिब्रेशन) का साल बनता दिख रहा है। अमेरिका की मजबूत लेकिन धीमी होती अर्थव्यवस्था, बदलते वैश्विक गठबंधन और सुरक्षा व प्रवासन की नई चुनौतियों के बीच 2026 अनिश्चितता और अनुकूलन की रेखा को धुंधला करता नजर आ रहा है।
धीमी पर स्थिर अमेरिकी अर्थव्यवस्था
2026 तक अमेरिकी अर्थव्यवस्था तेज रफ्तार के बजाय धीमी लेकिन स्थिर चाल पकड़ती दिख रही है। महामारी के बाद के वर्षों में हुए समायोजन के बाद महंगाई को फेडरल रिजर्व के लक्ष्य के करीब लाया गया है। अब असली चुनौती यह है कि कीमतों का दबाव लौटे बिना विकास को कैसे बनाए रखा जाए। रिकवरी के दौरान बड़े पैमाने पर भर्तियां करने वाली कंपनियां अब रणनीति बदल रही हैं। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और ऑटोमेशन से उत्पादकता में हुई बढ़ोतरी, कड़े श्रम बाजार के असर को काफी हद तक संतुलित कर रही है।
उपभोक्ता भरोसा अब भी झूले पर है। आम अमेरिकी परिवार महंगाई की मार महसूस कर रहा है, हालांकि नौकरियों की उपलब्धता तुलनात्मक रूप से बेहतर बनी हुई है। 2026 में आर्थिक आशावाद आंकड़ों से ज्यादा विश्वास पर निर्भर है—कि वेतन महंगाई के साथ कदम मिला पाएगा, हाउसिंग मार्केट पहली बार घर खरीदने वालों के लिए खुलेगा और फेड की ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की कोशिश ठहराव में नहीं बदलेगी।
परिपक्व होता भारत-अमेरिका साझेदारी का दौर
वैश्विक मंच पर भारत-अमेरिका साझेदारी 2026 में और परिपक्व होती दिख रही है। बीते वर्षों में रक्षा और तकनीक से जुड़े समझौते अब ज़मीन पर उतरने लगे हैं। सेमीकंडक्टर निर्माण, साइबर सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग ठोस रूप ले रहा है। दोस्ती के प्रतीकात्मक इशारों की जगह अब जॉइंट वेंचर्स, रिसर्च हब्स और आत्मनिर्भरता के साझा प्रयास दिख रहे हैं—वह भी अलगाववाद के बिना।
इमिग्रेशन पर बदली बहस
2026 में आव्रजन (इमिग्रेशन) की राजनीति अब भी संवेदनशील है, लेकिन बहस पहले से ज्यादा व्यावहारिक होती दिख रही है। स्वास्थ्य, कृषि और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में श्रमिकों की कमी ने नीति-निर्माताओं और उद्योग जगत को वीजा सुधारों पर गंभीर होने को मजबूर किया है। कुछ सुधारों से प्रक्रिया तेज और निगरानी बेहतर हुई है, हालांकि ज़मीनी अमल अब भी असमान है।
जनभावना भी जटिल है। सुरक्षा चिंताओं और आर्थिक जरूरतों के बीच अमेरिका बंटा हुआ है। जलवायु परिवर्तन से प्रेरित लैटिन अमेरिका और अन्य क्षेत्रों से होने वाला पलायन दक्षिणी राज्यों की जनसांख्यिकी बदल रहा है। फीनिक्स, ऑस्टिन और अटलांटा जैसे शहर अब केवल संघीय हस्तक्षेप पर निर्भर रहने के बजाय स्थानीय स्तर पर एकीकरण सेवाओं में निवेश कर रहे हैं। सवाल अब यह नहीं कि अमेरिका इमिग्रेशन संभाल सकता है या नहीं, बल्कि यह है कि सांस्कृतिक ध्रुवीकरण बढ़ाए बिना इसे कैसे संभाला जाए।
वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था दबाव में
2026 में वैश्विक सुरक्षा ढांचा टूट नहीं रहा, लेकिन अत्यधिक दबाव में है। यूक्रेन और गाजा के युद्ध लंबे खिंचते चरण में हैं, जिससे पश्चिमी एकजुटता और जनसमर्थन की परीक्षा हो रही है। साथ ही साइबर युद्ध और दुष्प्रचार ने संघर्ष की परिभाषा बदल दी है—कई बार बिना एक भी गोली चले। एशिया में ताइवान अब भी भू-राजनीतिक तनाव का केंद्र है, हालांकि कूटनीतिक प्रतिरोध ने अब तक संतुलन बनाए रखा है। रक्षा खर्च बढ़ रहा है, लेकिन जोर पारंपरिक सेना के बजाय ड्रोन, एआई निगरानी, साइबर क्षमताओं और मिसाइल रक्षा प्रणालियों पर है। 2026 की यह असहज शांति कूटनीति जितनी, उतनी ही डिटरेंस पर टिकी है।
2026: अनुकूलन की असली परीक्षा
अगर 2025 पुनर्संतुलन का साल था, तो 2026 अनुकूलन की परीक्षा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था सीमित विकास और सीमित अपेक्षाओं के साथ जीना सीख रही है। भारत-अमेरिका जैसे गठबंधन दिखाते हैं कि रणनीतिक धैर्य कैसे ठोस साझेदारी में बदलता है। प्रवासन दबाव नीतिगत यथार्थवाद को जन्म दे रहा है और सुरक्षा मोर्चे पर यह समझ उभर रही है कि एकतरफावाद अब आत्मघाती है।
2026 का असली नीतिगत सवाल यह नहीं कि चुनौतियां खत्म हो गई हैं—वे मौजूद हैं। सवाल यह है कि क्या सरकारें अनुकूलन को शासन की स्थायी क्षमता बना पाती हैं। यह साल आर्थिक मजबूती से ज्यादा नीतिगत धैर्य की परीक्षा लेगा। भविष्य अतीत से टूट नहीं रहा, बल्कि उससे संवाद कर रहा है। 2026 के फैसले शायद सुर्खियां न बनाएं, लेकिन वही आने वाले दौर की शांत संरचना तय कर सकते हैं।
जीवन ज़ुत्शी लेखक और सामुदायिक नेता हैं। जो फ्रेमोंट (कैलिफ़ोर्निया) स्थित इंडो-अमेरिकन कम्युनिटी फेडरेशन के संस्थापक हैं।
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