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कनाडा में खालिस्तानी गतिविधियों पर लगाम लगाए ओटावा, भारत-कनाडा संबंधों को नुकसान: रिपोर्ट

रिपोर्ट में कहा गया है कि “कनाडा को भविष्य में किसी जनमत संग्रह को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए, लेकिन वह अल्बर्टा या क्यूबेक जैसा कोई मुद्दा नहीं है।

 खालिस्तानी ध्वज खालिस्तानी ध्वज / IANS

कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी चरमपंथी तत्व भारत के खिलाफ एजेंडा चलाने और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा करने के लिए कनाडाई धरती का इस्तेमाल कर रहे हैं। ओटावा को इस प्रवृत्ति पर सख्ती से रोक लगानी चाहिए, क्योंकि कोई भी देश अपने यहां से इस तरह के चरमपंथी प्रवासी समूहों को काम करने की इजाजत नहीं देता। यह बात 3 दिसंबर को प्रकाशित एक रिपोर्ट में कही गई है।

कनाडा आधारित न्यूज वेबसाइट वेस्टर्न स्टैंडर्ड के अनुसार, नवंबर 2025 में आतंकी संगठन सिख्स फॉर जस्टिस (SFJ) द्वारा ओटावा में कराया गया तथाकथित ‘खालिस्तान जनमत संग्रह’ ऐसे समय हुआ, जब कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान जोहान्सबर्ग में मिले थे। उस बैठक में व्यापारिक रिश्तों पर चर्चा हुई थी, ऐसे में यह गतिविधि कनाडा की विदेश नीति के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली बताई गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि “कनाडा को भविष्य में किसी जनमत संग्रह को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए, लेकिन वह अल्बर्टा या क्यूबेक जैसा कोई मुद्दा नहीं है। सिख्स फॉर जस्टिस द्वारा आयोजित खालिस्तान जनमत संग्रह अभियान चुपचाप चलाया जा रहा है। हाल ही में ओंटारियो, अल्बर्टा, ब्रिटिश कोलंबिया और क्यूबेक से आए 53 हजार से अधिक कनाडाई सिखों ने ओटावा में मतदान किया, जहां मतदाताओं की कतारें करीब दो किलोमीटर तक फैल गईं।”

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रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया कि कनाडा में भारत के बाहर सबसे बड़ी सिख आबादी में से एक रहती है, जो राजनीति, व्यापार, कला और सामाजिक जीवन में सक्रिय योगदान देती है। हालांकि, एक छोटा लेकिन मुखर वर्ग खालिस्तान समर्थक गतिविधियों में शामिल है, जिसे भारत अपनी संप्रभुता के लिए खतरा मानता है और इसी कारण कनाडा की आलोचना करता रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, कनाडाई सुरक्षा एजेंसियों को सिख चरमपंथी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए, लेकिन पूरे सिख समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने से बचना जरूरी है। इसमें कहा गया कि सिख पहले ही अपनी धार्मिक पहचान—पगड़ी और कृपाण—के कारण भेदभाव का सामना करते हैं और उन पर ‘दोहरे निष्ठा’ जैसे आरोप लगते रहे हैं। किसी भी समुदाय पर ऐसा ठप्पा नहीं लगाया जाना चाहिए।

रिपोर्ट का तर्क है कि कनाडा को नागरिकता को लेकर सख्त रुख अपनाना चाहिए और नए नागरिकों से अपेक्षा करनी चाहिए कि वे पुराने वैमनस्य और पूर्वाग्रह छोड़ें, अन्यथा नागरिकता रद्द करने जैसे कदमों पर भी विचार हो सकता है।

अंत में रिपोर्ट में जोर दिया गया कि राजनेताओं और सुरक्षा एजेंसियों को प्रवासी समुदायों से अधिक जिम्मेदारी की मांग करनी चाहिए और उन सभी समूहों पर रोक लगानी चाहिए जो कनाडा की राष्ट्रीय सुरक्षा या विदेश नीति को प्रभावित करने वाली गतिविधियों में संलग्न हैं। यह नीति केवल खालिस्तानी तत्वों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि हर उस समूह पर लागू होनी चाहिए जो कनाडा को विदेशी संघर्षों का मंच बनाना चाहता है।

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