प्रतीकात्मक तस्वीर / enerated using AI
वेलेंटाइन को समर्पित इस दिवस पर उस व्यक्ति को याद किया जाता है, जिसने ईसाई परंपरा के अनुसार साम्राज्यिक दबाव के बीच भी विवाह की पवित्रता का समर्थन किया। आज जब डेटिंग और विवाह पर चर्चा होती है, तब यह भी विचार करना आवश्यक है कि प्रेम को साहस, जिम्मेदारी और धर्म के साथ कैसे सम्मान दिया जाए।
पिछले 20 वर्षों में लेखक ने 1,300 से अधिक युवाओं का अंतरधार्मिक संबंधों में मार्गदर्शन किया है और अपने अनुभवों को पांच पुस्तकों में संक्षेपित किया है। उनके अनुभव के अनुसार, अमेरिका में लगभग 38 प्रतिशत हिंदू विवाह ईसाई, यहूदी या मुस्लिम समुदाय के साथ होते हैं। ऐसे में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कॉलेज के वर्षों में 70–80 प्रतिशत हिंदू युवाओं ने अब्राहमिक पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति के साथ संबंध बनाया हो।
लेखक स्पष्ट करते हैं कि वे अंतरधार्मिक विवाह के पक्ष या विपक्ष में नहीं हैं। उनका उद्देश्य केवल यह है कि युवा पूरी जानकारी के साथ निर्णय लें, ताकि वे सुखी और स्थायी वैवाहिक जीवन का निर्माण कर सकें।
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हिंदू अभिभावकों के लिए संदेश
यदि माता-पिता यह मान लें कि अमेरिका में उनका बेटा या बेटी स्वतः ही अपनी जाति के भीतर पारंपरिक विवाह करेगा, तो यह आज की वास्तविकता से मेल नहीं खा सकता। विकल्पों को अत्यधिक सीमित करना सही जीवनसाथी मिलने की संभावना नहीं बढ़ाता। इसके बजाय बच्चों को विवाह के विषय में शिक्षित करें, उन्हें ज्ञान से सुसज्जित करें और फिर उन पर विश्वास रखें। इससे परिणाम अधिक स्वस्थ और स्थिर होंगे।
लेखक के अनुसार उन्होंने ऐसे अंतरधार्मिक विवाह भी देखे हैं जो प्रेमपूर्ण, सम्मानजनक और दीर्घकालिक रहे। वहीं ऐसे उदाहरण भी देखे हैं, जहां दीर्घकालिक धार्मिक अपेक्षाओं को समझे बिना संबंध में प्रवेश करने के कारण हिंदू युवाओं को गहरी पीड़ा झेलनी पड़ी।
मूल प्रश्न: समस्या धर्म नहीं, दृष्टिकोण है
लेखक के अनुभव में समस्या धर्म या धर्मग्रंथ नहीं, बल्कि मानसिकता है। वास्तविक चुनौती ‘एकाधिकारवादी सोच’ है — वह दृष्टिकोण जो मानता है कि केवल एक ही मार्ग सत्य है और अन्य सभी मार्ग आध्यात्मिक रूप से निम्न या अमान्य हैं।
कुछ परंपराओं में यह विश्वास भी शामिल होता है कि मुक्ति या उद्धार केवल उसी धर्म में संभव है। ऐसी मान्यताएं विवाह से पहले या बाद में धर्मांतरण के दबाव को जन्म दे सकती हैं।
‘पीढ़ी छोड़कर धर्मांतरण’ की नई प्रवृत्ति
आज कई हिंदू युवा विवाह से पहले धर्मांतरण से इंकार कर देते हैं। लेकिन एक नई प्रवृत्ति उभर रही है, जिसे लेखक ‘पीढ़ी छोड़कर धर्मांतरण’ कहते हैं। इसमें जीवनसाथी से धर्मांतरण की अपेक्षा नहीं की जाती, बल्कि बच्चों को एक ही धर्म में पालन-पोषण देने पर जोर दिया जाता है।
सार्वजनिक जीवन में भी ऐसे उदाहरण देखे गए हैं जहां एक पक्ष ने धर्म नहीं बदला, परंतु बच्चों को पूरी तरह दूसरे धर्म में पाला गया। परिणामस्वरूप एक ही पीढ़ी में हिंदू वंश परंपरा प्रभावी रूप से समाप्त हो जाती है।
धार्मिक अपेक्षाओं को समझना आवश्यक
कुछ कैथोलिक व्यवस्थाओं में चर्च में विवाह के लिए गैर-ईसाई जीवनसाथी को यह लिखित आश्वासन देना पड़ता है कि बच्चों को ईसाई परंपरा में बपतिस्मा देकर पाला जाएगा। कई हिंदू ‘द्वि-समारोह’ को समानता मान लेते हैं, परंतु वे धार्मिक संस्थागत अपेक्षाओं को पूरी तरह नहीं समझ पाते। बाद में, विशेषकर बाल- अभिरक्षा विवादों में, यह गंभीर प्रभाव डाल सकता है।
इसी प्रकार, कुछ हिंदू-यहूदी विवाहों में नामकरण संस्कार और बार या बाट मिट्ज़्वा दोनों किए जाते हैं। ऊपर से यह समान दिखता है, लेकिन औपचारिक धार्मिक शिक्षा और पहचान निर्माण की गहराई एक पक्ष में अधिक हो सकती है।
कई हिंदू-मुस्लिम विवाहों में निकाह से पूर्व धर्मांतरण की अपेक्षा की जाती है और सामान्यतः बच्चों को मुस्लिम परंपरा में ही पाला जाता है। यद्यपि अपवाद संभव हैं, परंतु विवाह से पहले सामान्य अपेक्षाओं को समझना आवश्यक है।
प्रेम के साथ दूरदर्शिता भी जरूरी
वेलेंटाइन डे पर संदेश स्पष्ट है — प्रेम सुंदर है, आकर्षण स्वाभाविक है, पर विवाह केवल रोमांस नहीं है। यह साझा दृष्टिकोण, साझा मूल्य और आने वाली पीढ़ियों के प्रति साझा जिम्मेदारी का विषय है।
लेखक इंटरफेथशादी डॉट ओआरजी और हिंदूस्पीकर्स डॉट ओआरजी के संस्थापक हैं। पिछले 20 वर्षों में उन्होंने अंतरधार्मिक संबंधों में 1,300 से अधिक युवाओं का मार्गदर्शन किया है और अपने अनुभवों को पाँच पुस्तकों में संक्षेपित किया है।
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