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इमिग्रेशन का डर भारतीयों के लिए ‘वेक-अप कॉल’

अमेरिका में इमिग्रेशन को लेकर बढ़ता डर भारतीयों—खासतौर पर भारतीय प्रवासी समुदाय—के लिए एक “वेक-अप कॉल” और “सहानुभूति का वास्तविक पाठ” हो सकता है।

 शॉर्टलिस्ट उपन्यासकार किरण देसाई शॉर्टलिस्ट उपन्यासकार किरण देसाई / image provided

भारतीय-अमेरिकी लेखिका और बुकर पुरस्कार के लिए शॉर्टलिस्ट उपन्यासकार किरण देसाई ने कहा है कि अमेरिका में इमिग्रेशन को लेकर बढ़ता डर भारतीयों—खासतौर पर भारतीय प्रवासी समुदाय—के लिए एक “वेक-अप कॉल” और “सहानुभूति का वास्तविक पाठ” हो सकता है।

केरल लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान न्यू इंडिया अब्रॉड को दिए गए एक विशेष साक्षात्कार में देसाई ने कहा कि अमेरिका में प्रवासियों के खिलाफ सख्त होती बयानबाजी और डर का रोजमर्रा की जिंदगी में प्रवेश, भारतीय प्रवासी समुदाय को आत्ममंथन के लिए मजबूर करता है।

उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि भारतीय डायस्पोरा अमेरिका में सेक्युलर डेमोक्रेसी को लेकर बहुत चिंतित था, लेकिन भारत में उसे लेकर उतनी चिंता नहीं दिखाई दी। शायद अब यह एक वेक-अप कॉल साबित हो—और अगर ऐसा है तो यह अच्छी बात है। यह सहानुभूति का एक वास्तविक सबक हो सकता है।”

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अमेरिका का मौजूदा माहौल ‘बेहद असहज’
अपने बुकर-शॉर्टलिस्टेड उपन्यास ‘The Loneliness of Sonia and Sunny’ का जिक्र करते हुए देसाई ने कहा कि अमेरिका में मौजूदा समय उन्हें “बेहद असहज” लगता है। उनका कहना है कि इमिग्रेशन को लेकर सख्त होती राजनीति ने डर को लोगों की दिनचर्या का हिस्सा बना दिया है। उन्होंने कहा कि उनके विचार निजी भी हैं और राजनीतिक भी—क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा अमेरिका में बिताया है और उनकी लेखनी विभिन्न संस्कृतियों के बीच आवाजाही से आकार लेती है।

प्रवासी इलाक़ों से दिखता डर
किरण देसाई न्यूयॉर्क के जैक्सन हाइट्स, क्वींस में रहती हैं, जिसे दुनिया के सबसे विविध और प्रवासी-बहुल इलाकों में गिना जाता है। उन्होंने कहा, “मैंने प्रवास के खिलाफ नफ़रत भरी बयानबाजी को बहुत क़रीब से देखा है। जैसा कि जोहरान ममदानी ने कहा—यह देश प्रवासियों ने बनाया है और प्रवासियों ने ही इसे आगे बढ़ाया है। और आज न्यूयॉर्क जैसे शहर का नेतृत्व भी एक प्रवासी कर रहा है।”

अपने अपार्टमेंट की खिड़की से दिखने वाले दृश्य का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय बहस उनके लिए अमूर्त नहीं, बल्कि रोजमर्रा की सच्चाई है। “मुझे यह इलाक़ा बहुत सौभाग्य की तरह लगता है, लेकिन अब मैं देख रही हूं कि उस जीवंतता में कमी आ रही है और डर बढ़ रहा है। लोकतंत्र के लिए यह बेहद खतरनाक संकेत है—जब लोग बोलने से डरने लगें और घरों में सिमट जाएं।”

वैश्विक परिप्रेक्ष्य जरूरी
किरण देसाई ने चेताया कि अमेरिका को अलग-थलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, “भारत में भी प्रवासियों और अल्पसंख्यकों के खिलाफ बयानबाजी बढ़ी है। यह एक वैश्विक प्रवृत्ति है। इससे प्रवासी और अल्पसंख्यक खुद को बेहद असुरक्षित महसूस करते हैं—भारतीय डायस्पोरा भी इसमें शामिल है।” उनके मुताबिक, ऐसी परिस्थितियों में प्रवासियों के पैरों तले से जमीन खिसकने लगती है। “आप सोचते हैं कि आप किसी देश में बस गए हैं, लेकिन अचानक अपना हीपन महसूस होना खत्म होने लगता है।”

लेखन, एकांत और प्रवास
फेस्टिवल में पहले दिए गए अपने वक्तव्य का हवाला देते हुए देसाई ने प्रवास और लेखन के बीच समानताओं पर बात की। उन्होंने कहा, “प्रवास, अनुवाद, नैतिक अस्पष्टता, तरल पहचान—ये सभी शब्द कला और लेखन की भाषा से मेल खाते हैं।” उनके मुताबिक, लेखक का जीवन भी लगातार अलग-अलग दुनियाओं में रहने जैसा होता है। “एक कलाकार के रूप में आप हमेशा कई दुनियाओं में रहते हैं। इस लिहाज से प्रवासी होना और लेखक होना—दोनों एक-दूसरे के अनुकूल हैं।” उन्होंने कहा कि एकांत और अकेलापन कला और प्रवास—दोनों का अनिवार्य हिस्सा हैं।

‘एक कहानी’ की मांग पर सवाल
डायस्पोरा लेखकों से एक ही तरह की कहानी की अपेक्षा पर बोलते हुए देसाई ने कहा कि यह दबाव हमेशा से रहा है। “देश एक सरल नैरेटिव चाहते हैं—एक किताब, एक कहानी। लेकिन सच्चाई कहीं ज्यादा जटिल है।” उन्होंने भारत को लेकर अपने उपन्यास की एक पंक्ति का जिक्र किया— “भारत में कहानियां पेड़ों पर उगती हैं।” साथ ही उन्होंने अमेरिका में साहित्यिक स्वतंत्रता पर बढ़ते खतरे की ओर भी इशारा किया। “आज किताबें शेल्फ़ से हटाई जा रही हैं। यह भी चिंता का विषय है।”

नई आवाजें, नई उम्मीद
किरण देसाई ने प्रवासियों के पक्ष में खुलकर बोलने वाले युवा नेताओं, खासकर जोहरान ममदानी, की सराहना की। उन्होंने कहा, “मैं खुश हूं कि वह युवा हैं, उनमें युवाओं का आत्मविश्वास है और वे ट्रंप की नीतियों के खिलाफ बोल रहे हैं—प्रवासियों और अल्पसंख्यकों के लिए आवाज उठा रहे हैं।” उन्होंने कहा कि प्रवासियों के श्रम को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। “ये लोग दिन-रात मेहनत करते हैं। मुझे गर्व है कि हमारी दुनिया का एक हिस्सा—आधा ही सही—हमारी तरफ से बोल रहा है।”

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