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एक कहानी, जिसे हमने मिलकर लिखा

मैं अमेरिका एक ऐसे हवाई टिकट पर आया था, जिसका खर्च बैंक से लिए गए कर्ज और मेरी बुआ की जमा-पूंजी से पूरा हुआ था।

 सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर / Generated using AI

मैं अमेरिका एक ऐसे हवाई टिकट पर आया था, जिसका खर्च बैंक से लिए गए कर्ज और मेरी बुआ की जमा-पूंजी से पूरा हुआ था।
मेरे पास भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) की डिग्री थी, एक बैग था और अमेरिका के बारे में बस उतनी ही जानकारी थी, जितनी किसी नक्शे पर देखकर मिल सकती है।
जब मैं अकेला मोंटाना पहुंचा, तब मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि अमेरिकी सपना मेरे लिए क्या लेकर आया है। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि एक दिन मैं ऐसी कंपनियां खड़ी करूंगा, जो सैकड़ों लोगों को रोजगार देंगी और लाखों लोगों की स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने में योगदान देंगी।
यही मेरी अमेरिकी कहानी है। लेकिन समय के साथ मुझे यह एहसास हुआ कि यह कहानी सिर्फ मेरी नहीं है। यह अमेरिकी सफलता की कहानी उन सिख किसानों की भी है, जिन्होंने 1800 के दशक में कैलिफोर्निया की सेंट्रल वैली की धरती पर खेती की।
यह उन भारतीय मजदूरों की भी कहानी है, जिन्होंने 150 वर्ष से अधिक पहले अमेरिका की रेलवे लाइनें बिछाने में योगदान दिया।
यह उन भारतीयों की भी कहानी है, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिकी सेना में सेवा दी। और यह हमारी उस पूरी भारतीय-अमेरिकी बिरादरी की कहानी है, जिसने अमेरिका को अपना घर चुना। हम इस देश के पहले बसने वाले नहीं थे, लेकिन हम बहुत लंबे समय से अमेरिका की सफलता की कहानी का हिस्सा रहे हैं।
जब अमेरिका अपनी 250वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब यह कहानी पूरी ईमानदारी और गर्व के साथ सुनाई जानी चाहिए। मेरी अपनी यात्रा ने भी मुझे इस विरासत में योगदान देने का अवसर दिया।
मैं पंजाब के एक निम्न-मध्यमवर्गीय परिवार में पला-बढ़ा। मेरे पिता अपने समय के बेहतरीन हॉकी खिलाड़ियों में से एक थे। उन्होंने अपना पूरा जीवन मेहनत और अनुशासन के दम पर बनाया। यही दो मूल्य मेरी सफलता की नींव बने।
जब मैंने 1996 में सिएटल में एडिफेक्स की स्थापना की तब मैंने अपने पिता और परिवार से मिली दृढ़ता की सीख को अमेरिका द्वारा दिए जा रहे अवसरों के साथ जोड़ दिया। दो दशकों के भीतर एडिफेक्स एक वैश्विक हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी कंपनी बन गई, जो 21.5 करोड़ से अधिक मरीजों को सेवाएं प्रदान करती है।
लेकिन मैंने एक और महत्वपूर्ण बात सीखी। सफलता और अपनापन, दोनों एक ही चीज नहीं हैं। आज अमेरिका में 50 लाख से अधिक भारतीय-अमेरिकी रहते हैं। हम अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा प्रवासी समुदाय हैं और हमने शिक्षा, व्यवसाय, विज्ञान, चिकित्सा, तकनीक और सार्वजनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
हम केवल अमेरिकन ड्रीम का प्रतीक नहीं हैं, बल्कि उसके एक महत्वपूर्ण हिस्से हैं। फिर भी हमारी राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी अभी भी हमारे योगदान के बराबर नहीं पहुंची है।
इतिहास सिर्फ अतीत की याद नहीं होता। इतिहास हमारी पहचान बनाता है। पहचान से भागीदारी पैदा होती है और भागीदारी ही किसी लोकतंत्र के भविष्य को आकार देती है।
जब कोई युवा भारतीय-अमेरिकी यह जानता है कि उसके समुदाय के लोग 150 वर्ष पहले भी अमेरिका की धरती पर खेती कर रहे थे, तो उसके भीतर गर्व और निरंतरता की भावना पैदा होती है।
जब पहली पीढ़ी का कोई भारतीय उद्यमी यह समझता है कि उसके समुदाय ने भी कभी वही संघर्ष झेले थे, जिनसे वह आज गुजर रहा है, तो उसके भीतर आगे बढ़ने का आत्मविश्वास और उद्देश्य मजबूत होता है।
ऐसी कहानियां किसी सफल समुदाय को एक प्रभावशाली समुदाय में बदलने की ताकत रखती हैं और इस दिशा में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
हम दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र और सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच खड़े हैं। हम दोनों देशों को भीतर से समझते हैं। यही हमें 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण साझेदारियों में से एक भारत और अमेरिका के संबंधों को मजबूत करने की एक अनोखी क्षमता देता है।
जब अमेरिका अपनी 250वीं वर्षगांठ मना रहा है, तब मेरी एक सरल-सी उम्मीद है। अपनी कहानी अपने बच्चों को सुनाइए। अपने पड़ोसियों को सुनाइए। अपने चुने हुए जनप्रतिनिधियों को सुनाइए। जहां फैसले लिए जाते हैं, वहां अपनी मौजूदगी दर्ज कराइए।
ऐसे नेताओं और उम्मीदवारों का समर्थन कीजिए, जो हमारे समुदाय को समझते हों। इस बात पर गर्व कीजिए कि हमने कितनी लंबी यात्रा तय की है। हमारे समुदाय ने इस देश में अपनी जगह मेहनत से अर्जित की है और अमेरिका तब सबसे मजबूत होगा, जब यहां रहने वाले हर समुदाय की कहानी सुनी और स्वीकार की जाएगी।
मैं अमेरिका बैंक के कर्ज और अपनी बुआ की बचत के सहारे आया था। मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि यहां मेरा भविष्य क्या होगा। लेकिन आज मैं यह जानता हूं कि अमेरिका ने हमें सिर्फ अवसर नहीं दिए। इसने हमें ऐसा भविष्य दिया, जिसे हम सब मिलकर बेहतर बना सकते हैं, समृद्ध बना सकते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए और मजबूत बना सकते हैं।

लेखक गुरप्रीत सनी सिंह सिएटल स्थित उद्यमी और परोपकारी हैं। उन्होंने वर्ष 2014 में वैश्विक समग्र स्वास्थ्य संस्था ‘राउंडग्लास’ की स्थापना की थी।

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