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स्वतंत्रता दिवस पर एक आत्मचिंतन

हर वर्ष अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस पर जब पूरा देश अपने राष्ट्र के जन्म का उत्सव मनाता है, मैं एक सरल लेकिन गहरे सवाल पर विचार करती हूं - अमेरिका ने मुझे क्या दिया है?

 सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर / AI

हर वर्ष अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस पर जब पूरा देश अपने राष्ट्र के जन्म का उत्सव मनाता है, मैं एक सरल लेकिन गहरे सवाल पर विचार करती हूं - अमेरिका ने मुझे क्या दिया है? 
इस सवाल का उत्तर मेरे लिए बेहद गहरा है। अमेरिका ने मुझे मेरी पहचान दी, मेरा भविष्य दिया और समाज को कुछ लौटाने का अवसर दिया।
मेरा जन्म भारत के पंजाब में हुआ। मैं अपने परिवार में सात भाई-बहनों में सबसे छोटी हूं। हमारा परिवार 1947 में भारत के विभाजन की त्रासदी से हमेशा के लिए बदल गया था।
हालांकि मेरा जन्म विभाजन के बाद हुआ, लेकिन बचपन से ही मैंने अपने माता-पिता से बिछड़ने, संघर्ष और बलिदान की अनगिनत कहानियां सुनीं। विभाजन के दौरान मेरे माता-पिता को अपना पैतृक घर, जमीन-जायदाद और सारी संपत्ति जो आज के पाकिस्तान में थी। हमें उसे छोड़ना पड़ा। उन्हें अपना पूरा जीवन फिर से शून्य से शुरू करना पड़ा।
हमारा परिवार आजादी की कीमत पहले ही चुका चुका था। मेरे दो परदादा के भाई द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना में सेवा करते हुए शहीद हो गए थे। उनके बलिदान और विभाजन की कठिनाइयों ने हमारे परिवार को हिम्मत, धैर्य और उम्मीद के साथ जीना सिखाया।
हम पूर्वी पंजाब में एक पुराने पहाड़ी किले में रहते थे जिसे विभाजन के बाद विस्थापित परिवारों को रहने के लिए दिया गया था। वह घर अपने भीतर सदियों का इतिहास समेटे हुए था और प्राचीन सभ्यताओं के अवशेषों पर बना था।
हमारे परिवार की परंपरा के अनुसार, सिखों के दसवें गुरु गुरु गोबिंद सिंह जी कई बार हमारे घर आए थे। ऐसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक माहौल में पली-बढ़ी होने के कारण मेरे मन में इतिहास, आस्था और संघर्ष के प्रति गहरा सम्मान पैदा हुआ।
हालांकि हमारे पास खेती की जमीन थी, लेकिन जीवन आसान नहीं था। मेरे माता-पिता का मानना था कि शिक्षा ही बेहतर भविष्य का सबसे बड़ा रास्ता है।
उन्होंने अपनी हर उपलब्ध संसाधन अपने बच्चों की पढ़ाई पर खर्च कर दिया। मेरे सबसे बड़े भाई ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। इसके लिए हमारे परिवार ने आर्थिक रूप से लगभग सब कुछ दांव पर लगा दिया था।
लेकिन उस समय भारत में रोजगार के अवसर बहुत सीमित थे। पहले उन्होंने कोलकाता में कम वेतन वाली नौकरी की और बाद में उन्हें अमेरिका में उच्च शिक्षा का अवसर मिला।
उनकी यात्रा ने हमारे पूरे परिवार के लिए अमेरिका के दरवाजे खोल दिए। साल 1986 में मैं और मेरे पति वीरपाल टूर अपनी दो छोटी बेटियों के साथ अमेरिका आए।
उस समय हमारी बड़ी बेटी केवल दो वर्ष की थी और छोटी बेटी सिर्फ छह महीने की। मैंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से पढ़ाई की थी और मेरे पति ने थापर कॉलेज, पटियाला से शिक्षा प्राप्त की थी।
दूसरे प्रवासियों की तरह हमारी पहली नौकरियां हमारी योग्यता के अनुरूप नहीं थीं। लेकिन उन्होंने हमें भविष्य बनाने का मौका जरूर दिया। सिर्फ एक वर्ष के भीतर हम दोनों को अपनी शिक्षा और अनुभव के अनुरूप करियर मिल गया।
हमने मेहनत की, अपने परिवार को आगे बढ़ाया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। कई वर्षों बाद मेरे एक सहकर्मी ने मुझसे एक सवाल पूछा, जो आज भी मेरे मन में गूंजता है।
उन्होंने कहा कि भारत में आपके पास जमीन थी और आपके पति की अच्छी नौकरी भी थी। आप अमेरिका में इतनी खुश नजर आती हैं। क्या आपने कभी वापस लौटने के बारे में सोचा? उनका सवाल सुनकर मैं कुछ देर के लिए ठहर गई।
मैंने खुद से पूछा आखिर अमेरिका ने मुझे ऐसा क्या दिया है? मेरा जवाब मुझे खुद भी चौंका गया। अमेरिका ने मुझे मेरी अपनी पहचान दी। भारत में मेरी पहचान अक्सर किसी की बेटी, किसी की बहन या किसी की पत्नी के रूप में होती थी। 
ये सभी रिश्ते आज भी मेरे लिए बेहद अनमोल हैं। लेकिन अमेरिका में मैं केवल बलजीत टूर बनी। मैंने अपनी मेहनत से अपना करियर बनाया, अपनी कमाई की और बिना किसी विरासत या संपत्ति के अपने दम पर सफलता हासिल की।
अमेरिका ने मुझे सिखाया कि यहां हर व्यक्ति को अपना भविष्य स्वयं गढ़ने का अवसर मिलता है। मैं और मेरे पति हमेशा मानते रहे कि अवसर के साथ जिम्मेदारी भी आती है।
इसलिए हमने अपना जीवन केवल परिवार और करियर तक सीमित नहीं रखा। हमने समाज की सेवा को भी उतना ही महत्व दिया।
मैंने रिवरसाइड काउंटी म्यूजियम सिस्टम में क्यूरेटर और म्यूजियम एजुकेटर के रूप में काम किया। इस दौरान मैंने पूरे समर्पण के साथ हमारे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने और संग्रहालयों के उच्च नैतिक मानकों को बनाए रखने का प्रयास किया।
मेरे काम का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को इतिहास और संस्कृति का महत्व समझाना था। इसके अलावा इंटरफेथ काउंसिल की अध्यक्ष के रूप में मैंने विभिन्न धर्मों के लोगों को एक साथ लाकर आपसी समझ, सम्मान और मित्रता को बढ़ावा देने का प्रयास किया।
मैंने व्यवहारिक मानसिक स्वास्थ्य यानी बिहेवियर मेंटल हैल्थ में विशेष प्रशिक्षण भी प्राप्त किया ताकि यह समझ सकूं कि आध्यात्मिकता और आस्था मानसिक एवं भावनात्मक चुनौतियों से जूझ रहे लोगों की किस प्रकार सहायता कर सकती है।
समाज सेवा हमेशा मेरे जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। मैं रेडलैंड्स आर्ट्स एंड कल्चर कमीशन, म्यूजियम ऑफ रेडलैंड्स के निदेशक मंडल, फ्रेंड्स ऑफ द एडवर्ड-डीन म्यूजियम की अध्यक्ष, GOPIO इनलैंड एम्पायर चैप्टर की उपाध्यक्ष और सिख एजुकेशन सोसाइटी ऑफ रिवरसाइड की सचिव के रूप में भी कार्य कर चुकी हूं।
मेरे लिए सेवा का हर अवसर उस देश के प्रति आभार व्यक्त करने का एक माध्यम था, जिसने मेरे परिवार को अपनाया और हमें इतना कुछ दिया।
मेरे पति ने भी अपना पूरा करियर कैलिफोर्निया के कई शहरों में पब्लिक वर्क्स डायरेक्टर के रूप में सार्वजनिक सेवा को समर्पित किया।
उन्होंने ऐसी आधारभूत संरचनाओं (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के निर्माण और रखरखाव में योगदान दिया, जिनका लाभ आज भी हजारों लोग उठा रहे हैं।
अमेरिका ने हमारे बच्चों को भी ऐसे अवसर दिए, जिनकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी। हमारी बड़ी बेटी स्थानीय स्कूल जिले में शैक्षणिक सलाहकार (एजुकेशनल काउंसलर) के रूप में विद्यार्थियों के सपनों को साकार करने में मदद कर रही है।
हमारी छोटी बेटी ने अपनी सफल वकालत (लॉ) फर्म शुरू की है। और हमारा बेटा न्यूयॉर्क में एक प्रौद्योगिकी स्टार्टअप का मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) है।
उनकी उपलब्धियां शिक्षा, कड़ी मेहनत और इस देश द्वारा दिए गए अवसरों का परिणाम हैं। मेरे जीवन का सबसे भावुक क्षण वह था, जब मैं अमेरिकी नागरिक बनी।
जब मैं सैकड़ों अन्य लोगों के साथ निष्ठा की शपथ ले रही थी तब मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे। मैं अपना जन्मस्थान नहीं छोड़ रही थी।
मैं अपनी विरासत को अपने साथ रखते हुए एक नए घर को अपना रही थी। उस शपथ के शब्दों ने मुझे यह एहसास कराया कि नागरिकता केवल एक कानूनी दर्जा नहीं होती।
यह एक वादा होता है
स्वतंत्रता की रक्षा करने का...
दूसरों का सम्मान करने का...
समाज के लिए योगदान देने का...
और अपने देश के भविष्य की जिम्मेदारी स्वीकार करने का।
आज भी मुझे अपने परिवार और बचपन के दोस्तों से मिलने पंजाब लौटना बेहद अच्छा लगता है।
वे यात्राएं मुझे हमेशा याद दिलाती हैं कि मेरी यात्रा कहां से शुरू हुई थी।
लेकिन जब भी मेरा विमान कैलिफोर्निया की धरती पर उतरता है, मैं मन ही मन भगवान का धन्यवाद करती हूं कि उन्होंने मुझे मेरे घर वापस पहुंचा दिया।
आज मेरा घर कैलिफोर्निया के रेडलैंड्स में है। अमेरिका ने मुझे अवसर, सम्मान, आत्मनिर्भरता, उद्देश्य और वह स्वतंत्रता दी, जिसने मुझे वह इंसान बनने का मौका दिया, जो मैं बनना चाहती थी।
इसके बदले में मैंने अपने काम, अपने परिवार और समाज सेवा के माध्यम से इस देश को कुछ लौटाने की कोशिश की है। मेरे लिए यही है कि अमेरिका ने मुझे क्या दिया।
और इसी वजह से हर 4 जुलाई को मैं कृतज्ञता से भरे हृदय के साथ अमेरिका का स्वतंत्रता दिवस मनाती हूं।

लेखिका बलजीत तूर कैलिफोर्निया में रहने वाली संग्रहालय क्यूरेटर और सामुदायिक नेता हैं।

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