क्या 2026 में कबड्डी के बिना रह पाएगा प्रवासी पंजाबी समुदाय / Special Arrangement
क्या उत्तरी अमेरिका, यूरोप या ऑस्ट्रेलिया में रहने वाला कोई भी प्रवासी पंजाबी समुदाय 2026 पूरा साल कबड्डी टूर्नामेंट के बिना बिताने की कल्पना कर सकता है? सतह पर यह असंभव सा लगता है। हालांकि, इस खेल के कट्टर प्रशंसकों का मानना है कि आत्ममंथन और सुधार के एक वर्ष के बाद कबड्डी और ज्यादा मजबूत व बेहतर तरीके से संगठित होकर वापसी करेगी। उनका कहना है कि अगर इसे सही ढंग से संगठित किया जाए, तो इसकी लोकप्रियता और वैश्विक अपील को देखते हुए इसे NBA, NFL और IPL की तर्ज पर भी चलाया जा सकता है।
कई जानकारों के मुताबिक सर्कल कबड्डी उस “फीनिक्स पक्षी” की तरह है, जो अपनी ही राख से दोबारा जन्म लेता है।
क्या यह सच में संभव है?
सरे (कनाडा) में रहने वाले खेल चिंतक और इतिहासकार तेजिंदर सिंह औजला कहते हैं, “हां, यह संभव है, बशर्ते खेल के दर्शन से छेड़छाड़ किए बिना, पूरी ईमानदारी के साथ हर स्तर पर गहन सुधार और पुनर्गठन किया जाए।” उन्होंने पंजाबी समुदाय के इस पारंपरिक खेल ‘मां खेल’ को गिरावट से बचाने के लिए एक विस्तृत ब्लूप्रिंट भी तैयार किया है।
दुनियाभर का पंजाबी समुदाय हर साल दीवाली के आसपास नवंबर से लेकर अप्रैल में फसल कटाई के मौसम तक आयोजित होने वाले अंतरराष्ट्रीय कबड्डी टूर्नामेंटों को लेकर बेहद उत्साहित रहता है। इन प्रतियोगिताओं में भारत, पाकिस्तान, इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, इटली, अमेरिका सहित कई देशों की टीमें हिस्सा लेती हैं। कई मौकों पर सिखों की सर्वोच्च धार्मिक संस्था शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की टीम ने भी इन टूर्नामेंटों की शोभा बढ़ाई है। यह एकमात्र ऐसी टीम रही है, जिसके खिलाड़ी बिना कटे बालों के अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत से बाहर खेले हैं।
पंजाबी समुदाय के लिए कबड्डी मनोरंजन का एक बड़ा साधन है, जिसका सालाना बजट अरबों डॉलर तक पहुंचता है।
हालांकि कबड्डी सालभर खेली जाती है, लेकिन सर्दियों में पंजाब में इनामी टूर्नामेंटों की भरमार रहती है। इस दौरान दुनिया भर से खिलाड़ी और खेल प्रेमी अपनी मातृभूमि लौटते हैं और अपने दमखम व कौशल का प्रदर्शन करते हैं। अंतरराष्ट्रीय कबड्डी महासंघ (FIFKA) ने जहां 2026 में दुनिया भर में कबड्डी टूर्नामेंटों पर रोक की घोषणा की है, वहीं पंजाब को इससे छूट दी गई है, जहां विश्वस्तरीय खिलाड़ी दर्शकों की खेल-भूख मिटा रहे हैं।
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कबड्डी का स्वरूप “नेशनल स्टाइल” है, जिसमें खेल का मैदान आयताकार और छोटा होता है। लेकिन पंजाबियों की असली पसंद “सर्कल स्टाइल” या “इंडियन स्टाइल” है, जिसमें गोल मैदान होता है।
हर टीम दो हिस्सों में बंटी होती है—रेडर और जाफियां (डिफेंडर)। रेडर जब विरोधी टीम के क्षेत्र में प्रवेश करता है, तो जाफियां उसे पकड़ने की कोशिश करते हैं। रेडर को बिना सांस तोड़े लगातार “कबड्डी” बोलते रहना होता है। जैसे ही उसका उच्चारण टूटता है, वह आउट मान लिया जाता है।
करीब 4,000 साल पुराने इतिहास वाला यह खेल एथलेटिक्स, कुश्ती, जिम्नास्टिक और जूडो का अनूठा मिश्रण है और वर्षों से पंजाबी प्रवासियों को अपनी मातृभूमि पंजाब से जोड़ने का माध्यम बना हुआ है।
हालांकि पंजाब इसे अपना पहला प्यार मानता है, लेकिन कबड्डी बांग्लादेश का राष्ट्रीय खेल है। ईरान ने 2006 एशियाई खेलों से पहले एक भारतीय कोच नियुक्त किया और आज वह इस खेल की बड़ी ताकत बन चुका है। ब्रिटिश सेना, ब्रिटिश पुलिस और आयरिश सेना भी लंबे समय तक कबड्डी को संरक्षण देती रही हैं।
तेजिंदर औजला के ब्लूप्रिंट के अनुसार, कबड्डी को लोकप्रियता, सांस्कृतिक जड़ों और निजी फंडिंग की कोई कमी नहीं है, लेकिन पेशेवर ढांचे और आधिकारिक मान्यता का अभाव है। उनका प्रस्ताव सर्कल कबड्डी को एक विश्वसनीय, टिकाऊ और मान्यता प्राप्त खेल में बदलने की समयबद्ध योजना पेश करता है।
वे “एक देश, एक फेडरेशन और एक नियमावली” की वकालत करते हैं। खिलाड़ियों की सुरक्षा, अनुशासन और गरिमा के लिए पंजीकरण अनिवार्य करने, पारदर्शी शासन, आचार संहिता, मानकीकृत मैदान, आधुनिक स्कोरिंग सिस्टम, कार्ड सिस्टम, वीडियो रिव्यू, मेडिकल सुविधा और डोपिंग जांच जैसे सुधारों पर जोर देते हैं।
उनका मानना है कि अगर अगले 10 वर्षों में यह सुधार लागू किए जाएं, तो सर्कल कबड्डी एक दिन ओलंपिक स्तर का खेल बन सकती है।
अब सवाल यह है—क्या इस ‘मां खेल’ को बचाने और संवारने के लिए कोई आगे आएगा?
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