सांकेतिक / Tapasya Chaubey
इब्न-ए-इंशा कहते हैं...
कुछ कहने का वक्त नहीं ये कुछ न कहो खामोश रहो
ऐ लोगो खामोश रहो हां ऐ लोगो खामोश रहो
जिस दौर में हम रह रहें हैं यह चुप्पियों का दौर है। कब किस बात पर किसकी भावनाओं को ठेस पहुंच जाए कह नहीं सकते। ऐसे में लोगों ने धीरे-धीरे चुप रहना अपना लिया है। भावनाओं से इतर यूं तो मोबाइल और रील की दुनिया ने भी लोगों को अकेला कर दिया है।
चुप रहने का दूसरा एक कारण आर्थिक सह परिवारिक जिम्मेदारी भी है। बाहर और घर के काम में इंसान कई बार इतना थक जाता है की बच्चों को टेबलेट/फोन दे कर चुप करा जाता है। इस चुप्पी जा असर तत्काल तो नहीं दिखता पर धीरे-धीरे यह हमारी इमेजिनेशन, क्रिएटिविटी, शब्द ज्ञान, और मानसिक स्वस्थ पर असर डालती है।
यह भी पढ़ें: संघर्ष का सौंदर्य दिखलाती है मसाका किड्स डॉक्यूमेंट्री
चुप्पी का असर यह है की कई शब्द ऐसे भी हैं जिनके न के बराबर प्रयोग से हम उसको भूल ही चुके हैं तो कई के अर्थ ठीक-ठीक बता नहीं पाते। मिसौरी, कैंसस और एरिजोना यूनिवर्सिटी ने मिलकर कर चौदह साल एक शोध किया।
शोध का विषय भाषा का लुप्त होना रहा। शोध के अनुसार हमारी भाषा से 338 शब्द प्रतिदिन कम हो रहे हैं। उन्होंने यह निष्कर्ष दो हजार लोगों के ऑडीओ डेटा के विश्लेषण जारी किया।
शोध में यह बताया गया कि साल 2005 में हम 16700 शब्द प्रतिदिन बोलते थे। वहीं साल 2019 के आते-आते 12500 शब्द प्रतिदिन बोलने लगे हैं। यानी हम कम बोल रहे हैं। कम बोलना हमें चुप्पा बना रहा है जो तमाम मानसिक बीमारियों को पैदा करने का एक कारण बन रहा है।
शब्दों के जरिए हम अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं। प्रेम से लेकर घृणा तक इसमें समाहित है। जब वे ही शरीर में कैद हो रही हों तो क्या ही कहा जाए? ऐसे में भारत भूषण पंत जी का एक शेर याद आ रहा है...
हर तरफ थी खामोशी और ऐसी खामोशी
रात अपने साए से हम भी डर के रोए थे
अन्य खबरें पढ़ने के लिए क्लिक करें न्यू इंडिया अब्रॉड
ADVERTISEMENT
ADVERTISEMENT
Comments
Start the conversation
Become a member of New India Abroad to start commenting.
Sign Up Now
Already have an account? Login