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विवेक रामास्वामी की विश्वविद्यालय सुधार योजना पर सवाल, तीखी आलोचना

छोटे कैंपस को विशेष उत्कृष्टता केंद्रों में बदलने के उनके प्रस्ताव की विश्वविद्यालय समर्थकों और रूढ़िवादी खेमे के कुछ वर्गों ने आलोचना की है।

विवेक रामास्वामी। / X image

ओहायो में रिपब्लिकन पार्टी से गवर्नर पद के उम्मीदवार विवेक रामास्वामी को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। आलोचकों ने उन पर उच्च शिक्षा में ऐसे सुधारों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है, जिनसे उनके मुताबिक भारतीय पेशेवरों और H-1B वीजा धारकों को फायदा हो सकता है।

यह विवाद तब शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया पर एक यूजर ने आरोप लगाया कि रामास्वामी ने ओहायो के कुछ जाने-माने विश्वविद्यालयों- जैसे कि यूनिवर्सिटी ऑफ एक्रॉन, केंट स्टेट यूनिवर्सिटी और सेंट्रल स्टेट यूनिवर्सिटी- को बंद करने के अपने विचार पर और भी अधिक जोर दिया। 

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उस यूजर ने दावा किया कि यह कदम देश के भीतर STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को कमजोर करने और उन 20,000 स्थानीय लोगों से नौकरियां छीनने की एक कोशिश है, जिन्हें ये विश्वविद्यालय रोजगार देते हैं। ऐसा करने का मकसद विदेशी प्रतिभाओं को फायदा पहुंचाना है।

 



यह आलोचना रामास्वामी के एक लेख (ओपिनियन पीस) के बाद सामने आई, जो 'द कोलंबस डिस्पैच' अखबार में छपा था। इस लेख में उन्होंने तर्क दिया था कि ओहायो को अपने 'बिखरे हुए' सार्वजनिक विश्वविद्यालय तंत्र में सुधार करने की सख्त जरूरत है।

हालांकि, अपने इस लेख में रामास्वामी ने किसी भी संस्थान को पूरी तरह से बंद करने की बात साफ तौर पर नहीं कही थी, लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा था कि राज्य का उच्च शिक्षा मॉडल अब और ज्यादा समय तक चल पाने लायक नहीं है और इसमें ढांचागत बदलाव की जरूरत है।

रामास्वामी के अनुसार, ओहायो इस समय आबादी और शिक्षा, दोनों ही क्षेत्रों में बड़े बदलावों का सामना कर रहा है। उन्होंने लिखा कि राज्य में हाई स्कूल पास करने वाले छात्रों की संख्या अपने चरम पर पहुंच चुकी है और अनुमान है कि 2041 तक इसमें 17 प्रतिशत की गिरावट आ जाएगी। उन्होंने चार साल के कॉलेज कोर्स में छात्रों की घटती दिलचस्पी की ओर भी इशारा किया और बताया कि 2015 में दाखिले की दर 59 प्रतिशत थी, जो 2021 तक घटकर 47.6 प्रतिशत रह गई। इसके साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि पिछले 15 सालों में ओहायो के सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का खर्च लगभग 50 प्रतिशत तक बढ़ गया है।



रामास्वामी ने तर्क दिया कि ओहायो अपने संसाधनों को 14 सार्वजनिक विश्वविद्यालयों, 24 क्षेत्रीय शाखाओं और 22 कम्युनिटी कॉलेजों के बीच बहुत ज्यादा बांट रहा है, जिससे संसाधन कम पड़ रहे हैं। उन्होंने यह सुझाव दिया कि संस्थानों को पूरी तरह से बंद करने के बजाय, छोटे या कम दाखिले वाले परिसरों को विशेष 'उत्कृष्टता केंद्रों' में बदल दिया जाए, जो किसी खास शैक्षणिक क्षेत्र की मजबूती पर केंद्रित हों।

स्वामी ने लिखा- विशेषज्ञता से अलग पहचान बनती है, और अलग पहचान छात्रों को आकर्षित करती है। उनका तर्क था कि विश्वविद्यालयों को अपनी गुणवत्ता सुधारने और खर्च कम करने के लिए उन चीजों पर ध्यान देना चाहिए जिन्हें वे सबसे अच्छे से कर सकते हैं।

इस प्रस्ताव की तब से लेकर अब तक विश्वविद्यालय समर्थकों और रूढ़िवादी खेमे के कुछ हिस्सों से आलोचना हुई है। उनका तर्क है कि इस तरह के पुनर्गठन का क्षेत्रीय संस्थानों और उन कॉलेज शहरों पर असमान रूप से बुरा असर पड़ सकता है, जो रोज़गार, दाखिले और स्थानीय आर्थिक गतिविधियों के लिए इन संस्थानों पर निर्भर हैं। आलोचकों ने यह भी कहा है कि इस योजना से राज्य के कुछ हिस्सों में सार्वजनिक उच्च शिक्षा तक लोगों की पहुंच कम हो सकती है।

कुछ आलोचकों ने इस प्रस्ताव को H-1B वीजा को लेकर हुई बहसों से रामास्वामी के पुराने जुड़ाव के नज़रिए से देखा। उनका तर्क था कि स्थानीय STEM संस्थानों को कमज़ोर करने से ओहियो के निवासियों के लिए शिक्षा और रोज़गार के अवसर कम हो जाएँगे।

इस प्रस्ताव के फिर से सामने आने पर ऑनलाइन प्रतिक्रिया तुरंत और तेज थी। एक यूजर ने लिखा- रामास्वामी को कभी नहीं!!!! ओहायो को बचाओ और ओहायो के विश्वविद्यालयों को बचाओ!!! ओहायो के गवर्नर के लिए केसी पुत्श को वोट दो!!!!”

कुछ प्रतिक्रियाएं तो साफ तौर पर भारत-विरोधी भी थीं। एक यूजर ने लिखा- ये धोखेबाज हैं; ये पूरी तरह से इस बात की कोई भी गुंजाइश खत्म कर देना चाहते हैं कि किसी भी अमेरिकी को कभी दोबारा कोई 'व्हाइट कॉलर' नौकरी मिल पाए। ये चाहते हैं कि अमेरिकी अपने नए मालिकों—यानी भारतीयों—की सेवा करें।

एक अन्य यूजर ने कहा, 'ये ओहायो को एक 'मिनी-इंडिया' (छोटा भारत) बना रहे हैं, जिसमें ये खुद राजा बने बैठे हैं,' जबकि तीसरे यूजर ने लिखा, 'आप किसी लड़के को 'बेईमान भारत' से तो बाहर निकाल सकते हैं, लेकिन उस लड़के के अंदर से 'बेईमान भारत' को बाहर नहीं निकाल सकते।

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