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सुधारों की कमी से जूझता संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका की फंडिंग कटौती से बढ़ी मुश्किलें

संयुक्त राष्ट्र पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि वह सशस्त्र संघर्षों में बढ़ोतरी और वैश्विक मानवीय संकटों से प्रभावी ढंग से निपटने में विफल रहा है।

भारतीय पीएम मोदी / IANS

वर्तमान दौर में घटती प्रासंगिकता और प्रभाव के बीच संयुक्त राष्ट्र (यूएन) गंभीर दबाव में है। इसकी बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह फैसला है, जिसके तहत अमेरिका ने यूएन की कई संस्थाओं से खुद को अलग करने और स्वैच्छिक फंडिंग में भारी कटौती करने का आदेश दिया है।

संयुक्त राष्ट्र पर यह भी आरोप लगते रहे हैं कि वह सशस्त्र संघर्षों में बढ़ोतरी और वैश्विक मानवीय संकटों से प्रभावी ढंग से निपटने में विफल रहा है। इसी कारण वैश्विक मंच पर उसकी साख और भूमिका पर लगातार सवाल उठ रहे हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई वैश्विक नेताओं ने समय-समय पर संयुक्त राष्ट्र में संस्थागत सुधारों की मांग की है। सितंबर 2023 में जी20 शिखर सम्मेलन (नई दिल्ली) के दौरान पीएम मोदी ने कहा था, “दुनिया को बेहतर भविष्य की ओर ले जाने के लिए यह जरूरी है कि वैश्विक संस्थाएं वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप हों। जब संयुक्त राष्ट्र बना था, तब दुनिया बिल्कुल अलग थी। उस समय इसके 51 संस्थापक सदस्य थे, जबकि आज करीब 200 देश इसके सदस्य हैं।”

प्रधानमंत्री ने 2024 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करते हुए भी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार, वैश्विक सहयोग और सतत विकास के लिए तकनीक के नियमन की जरूरत पर जोर दिया था। उनके इस विचार का कई अन्य नेताओं ने भी समर्थन किया।

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80 वर्ष पूरे कर चुका संयुक्त राष्ट्र आज संरचनात्मक जड़ता, फंड की कमी और महाशक्तियों की पीछे हटती भूमिका के कारण गंभीर विश्वसनीयता और क्षमता संकट का सामना कर रहा है। नवंबर में IBSA (भारत-ब्राजील-दक्षिण अफ्रीका) शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी ने दोहराया था कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधार अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है।

हाल के वर्षों में कई आपात बैठकें भी किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच सकीं। अमेरिका के वेनेजुएला में सैन्य अभियान और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के बाद बुलाई गई आपात UNSC बैठक भी सहमति के बिना समाप्त हो गई। अन्य वैश्विक संघर्षों में भी संयुक्त राष्ट्र की भूमिका सीमित ही नजर आई।

अब अमेरिका द्वारा फंडिंग में और कटौती से संयुक्त राष्ट्र की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। व्हाइट हाउस के अनुसार, ट्रंप ने बुधवार को आदेश दिया कि अमेरिका संयुक्त राष्ट्र की 31 संस्थाओं और 35 अन्य अंतरराष्ट्रीय निकायों से “यथाशीघ्र” बाहर निकल जाएगा और फंडिंग बंद करेगा। इससे पहले भी अमेरिका कई यूएन एजेंसियों से बाहर निकल चुका है या फंड में कटौती कर चुका है।

विशेषज्ञों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र की मौजूदा हालत उसके गहरे संस्थागत सुधारों में लगातार विफल रहने का नतीजा है। UNSC की संरचना और वीटो व्यवस्था जैसी पुरानी व्यवस्थाएं, एजेंसियों के बीच दोहराव, मिशन का अनावश्यक विस्तार और फंडिंग की अस्थिरता ने संगठन को कमजोर किया है।

बढ़ते वित्तीय संकट के बीच संयुक्त राष्ट्र ने पिछले साल सदस्य देशों से बकाया भुगतान करने की अपील की थी। मई में जारी एक बयान में यूएन ने कहा था, “संयुक्त राष्ट्र गंभीर नकदी संकट का सामना कर रहा है, जो उसके अहम कार्यों को प्रभावित कर रहा है। नियमित बजट में 2.4 अरब डॉलर और शांति स्थापना में 2.7 अरब डॉलर का बकाया है, जिससे खर्च में कटौती, भर्ती पर रोक और कुछ सेवाओं को सीमित करना पड़ा है।”

यूएन अधिकारियों ने चेतावनी दी थी कि इससे संगठन की विश्वसनीयता और उसके दायित्व निभाने की क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है।

जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने पहले कहा था, “यह प्रकृति का नियम है कि जो व्यक्ति या संगठन समय के साथ खुद को नहीं ढालते, वे अपनी प्रासंगिकता खो देते हैं। हमें खुले मन से सोचना होगा कि बीते वर्षों में कई क्षेत्रीय मंच क्यों उभरे और वे प्रभावी भी साबित हो रहे हैं।”

संयुक्त राष्ट्र आज इसी चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है, जहां सुधारों के बिना उसकी वैश्विक भूमिका और कमजोर होने की आशंका जताई जा रही है।

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