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सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग तेज, भारत ने कहा- बदलना होगा 1945 का तंत्र

भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने मंगलवार को कहा कि अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में सुरक्षा परिषद सुधारों पर कोई प्रगति न होना इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और आठ दशक पुराने ढांचे को बदलना नहीं चाहते।

 भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश / X/@IndiaUNNewYork

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC), जो 1945 की दुनिया में अटकी हुई है, अपनी विश्वसनीयता के संकट का सामना कर रही है। भारत ने कहा है कि 'जमे हुए हित' सुधारों को रोक रहे हैं, जबकि ये सुधार आज की चुनौतियों से निपटने के लिए जरूरी हैं।
 
भारत के स्थायी प्रतिनिधि पी. हरीश ने मंगलवार को कहा कि अंतर-सरकारी वार्ताओं (IGN) में सुरक्षा परिषद सुधारों पर कोई प्रगति न होना इस बात का संकेत है कि कई सदस्य देश यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं और आठ दशक पुराने ढांचे को बदलना नहीं चाहते।

यह भी पढ़ें: भारत ने यूएन में दो स्तरीय स्थायी सदस्यता का किया विरोध

सुधारों को मुख्य रूप से कुछ देशों का एक छोटा समूह रोकता है, जिसे 'यूनाइटिंग फॉर कंसेंसस' (UFC) कहा जाता है। इसका नेतृत्व इटली करता है और इसमें पाकिस्तान भी शामिल है। यह समूह प्रक्रिया से जुड़े नियमों का इस्तेमाल करके बातचीत को आगे बढ़ने से रोकता है।

हरीश मंगलवार को 'संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों को बनाए रखने और यूएन-केंद्रित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को मजबूत करने' पर हुई बहस में बोल रहे थे। भारत के सुधार प्रस्तावों का मुख्य हिस्सा सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता को बढ़ाना है।

हरीश ने कहा कि हमें स्थायी सदस्यता श्रेणी को बढ़ाना ही होगा, क्योंकि इससे ही इस परिषद के फैसले लेने के तरीके में असली बदलाव आएगा। उन्होंने कहा कि अगर बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को नहीं ढाला गया, तो इससे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की ताकत, विश्वसनीयता, वैधता और प्रभावशीलता और कम हो जाएगी।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने भी परिषद की विश्वसनीयता के संकट पर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा क‍ि ऐसी सुरक्षा परिषद जो आज की भू-राजनीतिक हकीकत को नहीं दिखाती, वह अपने दायित्वों को पूरी तरह निभा नहीं सकती। वैश्विक संस्थाओं को आज की वास्तविकताओं को दिखाना चाहिए, न कि 1945 की दुनिया को। और सबसे ज्यादा जरूरत इसी परिषद में है।

अफ्रीका को खास तौर पर स्थायी सदस्यता से बाहर रखे जाने की बात करते हुए गुटेरेस ने कहा कि सुधार का मतलब है इस परिषद की विश्वसनीयता को वापस लाना और इसे और बेहतर तरीके से सक्षम बनाना, ताकि यह चार्टर के अनुसार निर्णायक और समावेशी तरीके से काम कर सके।

हरीश ने कहा कि आज संयुक्त राष्ट्र की समस्याओं के केंद्र में एक ऐसा ढांचा है जो 1940 के दशक में ही अटका हुआ है। यह ऐसा है जैसे हम 1945 के इलेक्ट्रॉनिक कंप्यूटर 'एनिएक' पर आज की एडवांस एआई तकनीक चलाने की कोशिश कर रहे हों।

उन्होंने कहा कि मानवता ने अपनी प्रगति और जीवित रहने में सबसे बड़ा योगदान अपनी अनुकूलन क्षमता से दिया है, और संयुक्त राष्ट्र भी इससे अलग नहीं हो सकता।

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