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खालिस्तानी नेटवर्क पर प्रहार की तैयारी: भारत-कनाडा ने खुफिया सहयोग बढ़ाया

कनाडा लंबे समय से खालिस्तानी नेटवर्क के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखा जाता रहा है।

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और कनाडाई समकक्ष / IANS/MEA

भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की हालिया कनाडा यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई पंजाब में खालिस्तानी उग्रवाद को फिर से सक्रिय करने की कोशिशों में जुटी बताई जा रही है। डोभाल की अपने कनाडाई समकक्ष नथाली जी. ड्रौइन के साथ बैठक को रणनीतिक हलकों में “रचनात्मक” और “सार्थक” बताया गया है। इसे केवल कूटनीतिक संबंध सुधारने का प्रयास नहीं, बल्कि खालिस्तानी उग्रवाद को सहारा देने वाले अंतरराष्ट्रीय ढांचे को तोड़ने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।

कनाडा लंबे समय से खालिस्तानी नेटवर्क के लिए सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखा जाता रहा है। आरोप है कि पंजाब में लक्षित हत्याओं के मास्टरमाइंड टोरंटो और वैंकूवर से सक्रिय रहे, जबकि कुछ प्रवासी संगठनों ने भारत विरोधी गतिविधियों, धमकियों और मादक पदार्थ तस्करी से जुड़े नेटवर्क को सहारा दिया। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि नशा तस्करी और अवैध हथियारों का कारोबार अलगाववादी गतिविधियों को वित्तीय मदद पहुंचाता है, जिसमें पाकिस्तान के तत्वों की भूमिका भी रही है।

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डोभाल-ड्रूइन बैठक की सबसे अहम उपलब्धि चार क्षेत्रों खालिस्तानी उग्रवाद, मादक पदार्थ तस्करी, साइबर खतरे और सीमा पार तस्करी में वास्तविक समय की खुफिया जानकारी साझा करने पर सहमति है। यह कदम निगरानी से आगे बढ़कर सक्रिय कार्रवाई की दिशा में बदलाव माना जा रहा है। इसके तहत प्रमुख संचालकों, फंड जुटाने वालों और कट्टरपंथ फैलाने वालों की पहचान, उनके वित्तीय स्रोतों पर नजर, ऑनलाइन उग्रवाद की निगरानी और नशा-आतंक नेटवर्क पर प्रहार शामिल होगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह सहयोग जमीनी स्तर पर लागू होता है तो इससे कनाडा की धरती से पंजाब में गतिविधियों की योजना बनाने वाले नेटवर्क को बड़ा झटका लगेगा। भारत के लिए कनाडा से त्वरित खुफिया जानकारी मिलना उन तत्वों के खिलाफ कार्रवाई में निर्णायक साबित हो सकता है, जो अब तक कानूनी दायरे से बाहर रहे हैं। हालांकि यह भी स्पष्ट है कि इस प्रक्रिया की सफलता ओटावा की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी, खासकर घरेलू राजनीति और प्रवासी वोट बैंक के दबावों के बीच।

तात्कालिक प्रभाव के तौर पर दोनों देशों की एजेंसियों द्वारा निगरानी, गिरफ्तारियां, संपत्ति जब्ती और मॉड्यूल ध्वस्त करने की कार्रवाई तेज हो सकती है। फंडिंग और भर्ती की गतिविधियां जोखिमपूर्ण होंगी, जबकि नशा और हथियार तस्करी पर शिकंजा कसने से वित्तीय आधार कमजोर पड़ सकता है। इससे पंजाब में उग्रवाद को पुनर्जीवित करने की कोशिशों पर अंकुश लग सकता है।

रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि कनाडा वैध प्रवासी गतिविधियों और उग्रवादी गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित कर सख्ती बरतता है, तो वैश्विक स्तर पर खालिस्तानी नेटवर्क की पहुंच सीमित हो सकती है। वहीं पाकिस्तान की कथित रणनीति बाहरी ठिकानों के जरिए कम तीव्रता वाले संघर्ष को बढ़ावा देना—को भी झटका लगेगा।

हालांकि चुनौतियां भी कम नहीं हैं। कनाडा की आंतरिक राजनीति, न्यायिक प्रक्रियाएं और संसाधन आवंटन इस सहयोग की गति को प्रभावित कर सकते हैं। यह देखना होगा कि क्या यह कूटनीतिक पहल दीर्घकालिक और ठोस सुरक्षा कार्रवाई में बदल पाती है।

विश्लेषकों के मुताबिक, यह यात्रा केवल एक औपचारिक बैठक नहीं, बल्कि खालिस्तानी उग्रवाद को सहारा देने वाले अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को कमजोर करने की रणनीतिक पहल है। यदि निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता और खुफिया सहयोग बना रहा, तो निकट भविष्य में गिरफ्तारियां, संपत्ति फ्रीज, नशा बरामदगी और निर्वासन जैसी कार्रवाइयां इसके ठोस संकेतक हो सकती हैं।

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