पल्लोद परिवार / image provided
हंसी, सीख, स्नेह और चार पीढ़ियों को एक सूत्र में बांधने वाला परिवार। यही पहचान है पल्लोद परिवार की, जिसने अपने दिवंगत परदादा राजगोपाल पल्लोद के अंतिम स्वप्न को साकार करने के लिए गुजरात की धरती पर इतिहास रच दिया।
पल्लोद परिवार के 155 सदस्यों ने गुजरात की यात्रा कर चार धाम हिंदू तीर्थयात्रा के अंतिम धाम—द्वारकाधीश के दर्शन किए। यह यात्रा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं थी, बल्कि चार पीढ़ियों को जोड़ने वाली विरासत, स्मृतियों और पारिवारिक एकता का उत्सव भी थी।
चार धाम, एक परिवार और एक संकल्प
हिंदू धर्म में चार धाम यात्रा को आस्था की चरम उपलब्धि माना जाता है। यह न केवल विश्वास को सुदृढ़ करती है, बल्कि व्यक्ति को दिव्यता और भारत की पवित्र स्थलों से जोड़ती है। पल्लोद परिवार के लिए यह यात्रा उनके पुरखों को श्रद्धांजलि देने और एक साझा विरासत को जीवंत रखने का माध्यम बनी।
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इस परंपरा की शुरुआत वर्ष 1996 में हुई, जब पद्मा गट्टानी ने अपने भाई, दिवंगत जयप्रकाश पल्लोद की इच्छा को साकार करने के लिए पूरे परिवार को बद्रीनाथ—प्रथम धाम—ले जाने का संकल्प लिया। इसके बाद यह यात्रा एक सतत पारिवारिक परंपरा बन गई। वर्ष 2004 में परिवार ने राजस्थान की यात्रा कर नागौर में अपनी पैतृक जड़ों से जुड़ाव किया और मुंडन संस्कार संपन्न कराया। वर्ष 2010 में परिवार ने जगन्नाथ पुरी के दर्शन कर द्वितीय धाम पूर्ण किया, जबकि 2017 में केरल के रामेश्वरम पहुंचकर तृतीय धाम की यात्रा संपन्न हुई। अंततः वर्ष 2025 में गुजरात में द्वारकाधीश के दर्शन के साथ चार धाम यात्रा का यह ऐतिहासिक और भावनात्मक अध्याय पूर्ण हुआ।
दुनियाभर से जुटी चार पीढ़ियां
इस ऐतिहासिक यात्रा के लिए परिवार के सदस्य भारत और विदेशों से एकत्र हुए। यात्रा की शुरुआत हैदराबाद—परिवार के मुख्यालय—से ट्रेन द्वारा बड़ौदा तक हुई। इसके बाद चार बसों और तीन कारों में सफर करते हुए न केवल गुजरात के शहरों को, बल्कि एक-दूसरे को भी करीब से जाना।
पेल्लोद परिवार की तस्वीर / image providedपरिवार की चार पीढ़ियां इस यात्रा का हिस्सा बनीं सबसे वरिष्ठ पुरुषोत्तम पल्लोद (81 वर्ष) से लेकर सबसे छोटे तीन वर्षीय शिवेन पल्लोद तक। छह सदस्य व्हीलचेयर पर थे, लेकिन उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी। आठ पारिवारिक सहायकों ने पूरी यात्रा को सुगम बनाने में अहम भूमिका निभाई। विशेष बात यह रही कि एक सहायक ऐसा भी था, जो चारों धाम यात्राओं का साक्षी बना।
परिचय की शाम और भावनाओं का सागर
इतने बड़े समूह में कई नए चेहरे थे। इसलिए एक पूरी शाम परिचय के नाम रही—लाहोटी, राठी, मलानी और सबसे अहम, पल्लोद—वह बीज जिससे यह विशाल वटवृक्ष पनपा।
क्रिकेट उपलब्धियों से लेकर विश्वविद्यालय में दाखिलों तक, हल्के-फुल्के मज़ाक से लेकर प्रेरणादायक भाषणों तक—वह शाम गर्व, हंसी और अपनापन लेकर आई।
धर्म, प्रकृति और मनोरंजन का अनूठा संगम
यात्रा की शुरुआत स्टैच्यू ऑफ यूनिटी से हुई, जहां सरदार पटेल की विराट प्रतिमा ने सबको अभिभूत कर दिया। गिर सफारी में सोते शेर, सुस्त तेंदुए, हिरण, उल्लू और मगरमच्छों ने प्रकृति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया। समुद्र तट पर रेत के महल बनाते बच्चे और लहरों से खेलते परिवारजन—हर पल एक स्मृति बन गया।
बसों की यात्रा भी खास रही—कोई स्लीपर में आराम करता, तो कोई ताश खेलता, रील्स बनाता। नाश्ते की व्यवस्था इतनी भरपूर थी कि भोजन के बाद भी लोग ‘नाश्ता बॉक्स’ का इंतजार करते।
आध्यात्मिक शिखर: द्वारका
पोइचा नीलकंठ, सोमनाथ, गिरनार, नागेश्वर और अंत में द्वारकाधीश मंदिर—वह स्थान, जहां पहुंचना राजगोपाल पल्लोद की अंतिम इच्छा थी। भीड़, लंबी कतारें और थकान—पर परिवार के साथ होने पर ये सब गौण हो गए। भजन-कीर्तन और दर्शन ने हर मन को शांति दी।
शामों में संस्कृति और सीख
इस यात्रा की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि हर शाम संस्कृति, मनोरंजन और सीख से भरपूर रही। रासलीला नाइट में माहौल ऐसा बना मानो पूरा परिवार वृंदावन पहुंच गया हो, वहीं स्कूल स्पोर्ट्स डे ने हर उम्र के सदस्य को अपने भीतर के बच्चे को दोबारा जीने का मौका दिया। इसके साथ ही Rise and Shine: Generations Edition कार्यक्रम में परिवार के ही विशेषज्ञों ने वित्तीय समझ, रिश्तों की अहमियत, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य और समाज सेवा जैसे विषयों पर अपने अनुभव साझा कर जीवनोपयोगी सीख दी। यात्रा के दौरान ज्ञान और अनुभवों का दायरा भी बढ़ा—भुज में अर्थक्वेक म्यूज़ियम और राजकोट स्थित स्टार पाइप्स फाउंड्री का भ्रमण किया गया, जहां हेलमेट और गॉगल्स पहनकर उत्पादन की पूरी प्रक्रिया को करीब से देखा गया। यह अनुभव विशेष रूप से युवाओं के लिए आंखें खोलने वाला और प्रेरणादायक साबित हुआ।
रन ऑफ कच्छ और नए साल की शुरुआत
यात्रा का समापन व्हाइट रन ऑफ कच्छ में हुआ। ढलता सूरज, चमकती सफेद धरती और लक्ज़री टेंट्स—हर दृश्य मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। नए साल की पहली रात पूरे विस्तारित परिवार के साथ नाच-गाने में बीती—एक दुर्लभ सौभाग्य।
पर्दे के पीछे की मेहनत
इस भव्य आयोजन के पीछे महीनों की योजना थी। लक्ष्मीनारायण करवा, कमल पल्लोद और कुंज पल्लोद ने पहले गुजरात जाकर यात्रा का सर्वे किया। 18 वर्षीय कुंज पल्लोद ने पढ़ाई के साथ इस आयोजन को लगभग फुल-टाइम जिम्मेदारी की तरह निभाया।
एक जीवन भर की स्मृति
जैसा कि जुगल मलानी ने कहा, “पल्लोद परिवार में बड़ों के लिए सम्मान और छोटों के लिए स्नेह का संतुलन सचमुच दुर्लभ है।” लेखिका अनिका शारदा (कक्षा 10, न्यू इंग्लिश स्कूल, कुवैत) लिखती हैं, “यह मेरे जीवन का सर्वश्रेष्ठ अनुभव रहा। मैं आभारी हूं कि मैं हिंदू हूं, भारतीय हूं और पल्लोद परिवार का हिस्सा हूं।” यह यात्रा शायद अंतिम धाम थी, लेकिन इसकी स्मृतियां अनंत हैं।
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