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योग का बाजार अब 127 अरब डॉलर का, क्या कहीं कुछ खो रहा है?

अकेले टीचर ट्रेनिंग मार्केट ही 2.5 अरब डॉलर का है। सिर्फ अमेरिका में एक साल में 12,000 से ज्यादा योग टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम रजिस्टर हुए।

 सांकेतिक चित्र सांकेतिक चित्र / Pexels

हर साल 21 जून को दुनिया 'इंटरनेशनल योग डे' मनाती है। इस दिन लोग एक साथ सूर्य नमस्कार करते हैं, सरकारी कैंपेन चलाए जाते हैं और सोशल मीडिया पर 'वॉरियर II' पोज में लोगों की तस्वीरें छा जाती हैं। लेकिन इस ग्लोबल उत्साह के पीछे एक ऐसा सवाल है जिस पर सोचने की जरूरत है: जब भारत की एक पुरानी परंपरा अरबों डॉलर की इंडस्ट्री बन जाती है, तो असल योग पीछे छूट जाता है?

2025 में ग्लोबल योग मार्केट 127 अरब डॉलर का था और अनुमान है कि 2033 तक यह लगभग दोगुना होकर 269 अरब डॉलर का हो जाएगा। अकेले टीचर ट्रेनिंग मार्केट ही 2.5 अरब डॉलर का है। सिर्फ अमेरिका में एक साल में 12,000 से ज्यादा योग टीचर ट्रेनिंग प्रोग्राम रजिस्टर हुए। 

आज दुनिया भर में लगभग 3,00,000 योग टीचर हैं। यानी सर्टिफाइड इंस्ट्रक्टर की संख्या क्लासिकल भारतीय परंपराओं को गंभीरता से सीखने वाले स्टूडेंट्स से कहीं ज्यादा है। ये आंकड़े चौंकाने वाले हैं। और इनसे जो अंतर सामने आता है, वह भी हैरान करने वाला है।

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स्कॉलर श्रीना गांधी और लिली वुल्फ का कहना है कि जब पश्चिमी योग टीचर लोगों को योग से सिर्फ शारीरिक स्तर पर जुड़ना सिखाते हैं- बिना इसके इतिहास, जड़ों और दर्शन को जाने- तो वे इसकी असली गहराई और मतलब को कम करके इसे फिर से उपनिवेश (re-colonization) बना रहे होते हैं।

यह कोई मामूली या अलग-थलग राय नहीं है। रिसर्चगेट पर छपी एकेडमिक रिसर्च में बताया गया है कि कैसे ग्लोबलाइजेशन और कैपिटलिज्म के जरिए योग को एक कमोडिटी या प्रोडक्ट के तौर पर फिर से बनाया गया है। इसे स्कॉलर "सिंबॉलिक डिस्प्लेसमेंट" (सांकेतिक विस्थापन) कहते हैं। यानी किसी परंपरा को उसके सांस्कृतिक संदर्भ से निकालकर नए मार्केट के लिए नए रूप में पेश करना।

योग का असली मकसद- आत्म-जागरूकता, करुणा और व्यक्तिगत विकास को बढ़ावा देना- अब शारीरिक फिटनेस, लचीलेपन और दिखावे पर अधिक जोर दिए जाने के कारण पीछे छूट गया है। नतीजा यह है कि अब बीयर योग, गोट योग (बकरी के साथ योग) और 200 डॉलर के 'एथलीजर' सेट (स्पोर्ट्सवियर) बिक रहे हैं, जिन पर संस्कृत में कुछ लिखा होता है जिसे अधिकतर खरीदार पढ़ भी नहीं पाते।

भारतीय मूल के लोगों के लिए यह स्थिति थोड़ी असहज करने वाली है। बहुत से लोगों ने देखा है कि उनके माता-पिता का रोजाना का योग अभ्यास- जो सादा, बिना दिखावे वाला और बेहद निजी होता था- उसे एक 'आकांक्षी' (aspirational) चीज के तौर पर रीब्रांड करके दुनिया को ऊंची कीमत पर बेचा जा रहा है।

यहां तक कि इंडस्ट्री के एनालिस्ट भी अब योग मार्केट के सामने आने वाली बड़ी चुनौतियों में "सांस्कृतिक दुरुपयोग" (cultural misappropriation) को शामिल करते हैं, साथ ही इंस्ट्रक्टर के लिए स्टैंडर्ड नियम बनाने की जरूरत को भी। भारत के जानकारों का मानना ​​है कि पश्चिम के लिए सही तरीका योग करना बंद करना नहीं, बल्कि इसके इतिहास को जानना और सच्चे सांस्कृतिक आदान-प्रदान के साथ इसे जिम्मेदारी से अपनाना है।

शायद अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मनाने का सबसे ईमानदार तरीका यही है: किसी एकदम सही मुद्रा के साथ नहीं, बल्कि एक सच्चे सवाल के साथ कि हम असल में क्या कर रहे हैं, और क्या हमें पता है कि यह कहां से आया है?

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