त्रिनिदाद में जयपुर फ़ुट सेंटर का उद्घाटन जल्द होगा। / image provided
त्रिनिदाद और टोबैगो में जल्द ही एक स्थायी जयपुर फ़ुट कृत्रिम अंग फिटमेंट सेंटर स्थापित किया जाएगा। यह घोषणा वहाँ की प्रधानमंत्री कमला पर्साद-बिसेसर ने शुक्रवार को की। उन्होंने इसे amputees के लिए गरिमा और स्वतंत्रता का उपहार बताया।
त्रिनिदाद और टोबैगो के पीएम कमला प्रसाद बिसेसर ने नेशनल काउंसिल ऑफ़ इंडियन कल्चर, दिवाली नगर, पोर्ट ऑफ़ स्पेन में आयोजित जयपुर फ़ुट कैंप का उद्घाटन किया। इस अवसर पर भारत के उच्चायुक्त डॉ. प्रदीप सिंह राजपुरोहित, भगवान महावीर विकलांग सहायता समिति के संस्थापक डी आर मेहता और जयपुर फ़ुट, यूएसए के अध्यक्ष प्रेम भंडारी भी उपस्थित थे। इस कैंप में लगभग 800 विकलांग लोगों को निशुल्क जयपुर फ़ुट प्रदान किया गया, जिनमें पड़ोसी द्वीपों के लोग भी शामिल हुए।
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प्रधानमंत्री ने कहा कि त्रिनिदाद और टोबैगो में स्थापित स्थायी केंद्र सिर्फ़ इसी देश के लिए नहीं होगा, बल्कि यह कैरिकॉम क्षेत्र के अन्य देशों के विकलांगों तक भी सेवाएँ पहुँचाएगा। उन्होंने बताया कि जयपुर फ़ुट संगठन के संस्थापक डी आर मेहता ने केंद्र स्थापित करने के लिए आवश्यक मशीनरी दान की है। इस स्थायी केंद्र की लागत लगभग 1 लाख अमेरिकी डॉलर होगी।
कार्यक्रम की झलकियां। / image providedइस केंद्र के माध्यम से न केवल प्रोस्थेटिक अंग फिटिंग की सुविधा मिलेगी, बल्कि अम्फ़्यूटीज़ के लिए प्रशिक्षण और दीर्घकालिक उपचार भी उपलब्ध होगा। प्रधानमंत्री पर्साद-बिसेसर ने इसे मानवता में एक महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि भारत और त्रिनिदाद और टोबैगो की मित्रता का मूल्य उन जीवनों में मापा जाता है जिनमें सुधार और सम्मान आता है।
उन्होंने बताया कि प्रतिवर्ष त्रिनिदाद और टोबैगो में लगभग 350-400 निचले अंगों की कटाई होती है, मुख्य रूप से डायबिटीज के कारण। एक अंग खोने से किसी परिवार की आय में 20 से 40 प्रतिशत तक की कमी आ सकती है।
भारतीय उच्चायुक्त डॉ. प्रदीप सिंह राजपुरोहित ने कहा कि स्थायी केंद्र के लिए तकनीशियनों को भारत में प्रशिक्षण देने और प्रशिक्षकों को यहाँ लाने की योजना बनाई जा रही है। डी आर मेहता ने कहा कि जयपुर फ़ुट अब 47 देशों में 48,000 से अधिक लाभार्थियों के साथ विश्व का सबसे बड़ा विकलांग पुनर्वास संगठन बन गया है।
प्रधानमंत्री ने यह भी बताया कि आठ में से आठ विकलांगों को अंग मिलने के बाद बुनियादी गतिशीलता प्राप्त हो जाती है और आधे लाभार्थी एक साल में काम या स्कूल लौट जाते हैं। इससे समुदाय में उत्पादकता, आत्मविश्वास और गरिमा की लहर पैदा होगी।
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