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भारत में बैंकों के ‘फंसे कर्ज’ में बड़ी गिरावट, ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा NPA

भारत के वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि मार्च 2018 के बाद से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए में गिरावट निजी और विदेशी बैंकों की तुलना में अधिक रही है।

प्रतीकात्मक तस्वीर / IANS File Photo

भारत के बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में बड़ा सुधार देखने को मिला है। संसद को सोमवार को बताया गया कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (SCBs) का सकल गैर-निष्पादित आस्ति (NPA) अनुपात सितंबर 2025 के अंत तक घटकर ऐतिहासिक न्यूनतम स्तर 2.15 प्रतिशत पर पहुंच गया है। यह स्तर 2010-11 के मुकाबले भी कम है।

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के उपलब्ध ताजा आंकड़ों के अनुसार, 30 सितंबर 2025 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) का सकल एनपीए अनुपात 2.50 प्रतिशत रहा, जबकि निजी बैंकों में यह 1.73 प्रतिशत और विदेशी बैंकों में मात्र 0.8 प्रतिशत दर्ज किया गया।

लोकसभा में लिखित जवाब में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने बताया कि मार्च 2018 के बाद से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में एनपीए में गिरावट निजी और विदेशी बैंकों की तुलना में अधिक रही है। एनपीए में लगातार कमी से बैंकों का प्रावधान बोझ घटा है, जिससे उनकी लाभप्रदता और कारोबार वृद्धि को मजबूती मिली है।

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मंत्री ने कहा कि 2015 में आरबीआई द्वारा शुरू की गई एसेट क्वालिटी रिव्यू (AQR) और सरकार की ‘4R रणनीति’—एनपीए की पहचान, समाधान व वसूली, बैंकों का पुनर्पूंजीकरण और वित्तीय सुधार—के चलते यह सुधार संभव हो पाया है।

सरकार और आरबीआई एनपीए की रोकथाम, कमी और वसूली के लिए लगातार समन्वय से काम कर रहे हैं। इसके तहत डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल, सारफेसी अधिनियम, एनसीएलटी में आईबीसी के तहत मामले, समझौता निपटान और एनपीए की बिक्री जैसे उपाय शामिल हैं। इसके अलावा, आईबीसी में प्रक्रियागत देरी दूर करने के लिए संशोधन भी प्रस्तावित हैं।

इन प्रयासों का नतीजा यह रहा कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में नई एनपीए बनने की दर (स्लिपेज रेशियो) पिछले छह वर्षों में लगातार बेहतर हुई है, जिससे भारतीय बैंकिंग प्रणाली की सेहत मजबूत होने का संकेत मिलता है।

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