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भारत-अमेरिका व्यापार समझौते से कृषि आयात खुले, किसे फायदा और नुकसान?

भारत ने कुछ कृषि उत्पादों पर आयात बाधाएं कम करने पर सहमति जताई है, जिसे लेकर किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने चिंता जताई है।

प्रतीकात्मक तस्वीर / REUTERS/Rupak De Chowdhuri

भारत और अमेरिका ने एक अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा जारी किया है, जो टैरिफ में कटौती, ऊर्जा सहयोग के नए स्वरूप और आर्थिक साझेदारी को गहराने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। दोनों देश वैश्विक सप्लाई चेन को नए सिरे से संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं।

संयुक्त भारत–अमेरिका बयान से संकेत मिला है कि नई दिल्ली ने अमेरिकी दबाव के बावजूद अपने कृषि बाजार को पूरी तरह खोलने से इनकार किया। हालांकि, भारत ने कुछ कृषि उत्पादों पर आयात बाधाएं कम करने पर सहमति जताई है, जिसे लेकर किसान संगठनों और विपक्षी दलों ने चिंता जताई है।

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DDGS और सोयऑयल आयात से कौन फायदे में, कौन नुकसान में?
भारत अमेरिका से डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेन्स विद सॉल्युबल्स (DDGS) के आयात की अनुमति देने की तैयारी में है। DDGS, मक्का और अन्य अनाज से बने एथेनॉल का उप-उत्पाद है और प्रोटीन से भरपूर होता है। इससे घरेलू बाजार में पहले से मौजूद अधिशेष और बढ़ सकता है। इसका सबसे बड़ा फायदा भारत के करीब 30 अरब डॉलर के पोल्ट्री सेक्टर को मिलने की संभावना है, जहां कुल लागत का 60–70 प्रतिशत हिस्सा फीड पर खर्च होता है। सस्ता फीड मिलने से उत्पादन लागत घट सकती है।

लेकिन घरेलू तेलबीज प्रोसेसर और सोयाबीन किसान नुकसान में रह सकते हैं। DDGS की अधिक उपलब्धता से सोयामील जैसे ऑयलमील की मांग कमजोर हो रही है, जिससे तेलबीज की कीमतों पर दबाव बढ़ा है। यही कारण है कि कई किसान सोयाबीन और मूंगफली छोड़कर मक्का और चावल की ओर रुख कर रहे हैं, जबकि सरकार तेलबीज उत्पादन बढ़ाने की कोशिश कर रही है। DDGS की आपूर्ति और बढ़ने से भारत के एथेनॉल उत्पादकों की आय भी प्रभावित हो सकती है, जो पहले ही 20 प्रतिशत बायोफ्यूल ब्लेंडिंग लक्ष्य हासिल होने के बाद सुस्त मांग और खाली क्षमता से जूझ रहे हैं।

सोयऑयल के ड्यूटी-फ्री आयात को लेकर भी चिंता जताई गई है। हालांकि, मौजूदा ढांचे के तहत यह सुविधा केवल टैरिफ-रेट कोटा के भीतर ही मिलेगी। तय सीमा से ज्यादा आयात पर सामान्य शुल्क लगेगा, ताकि घरेलू उत्पादकों को संरक्षण मिल सके।

क्या ड्यूटी-फ्री कपास आयात से किसानों पर असर पड़ेगा?
भारत फिलहाल कपास आयात पर 11 प्रतिशत शुल्क लगाता है। अमेरिका से ड्यूटी-फ्री आयात घरेलू कीमतों पर दबाव डाल सकता है, लेकिन असर सीमित रहने की संभावना है। सरकार ने केवल अतिरिक्त लंबी रेशा (एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल) कपास के सीमित कोटा के तहत आयात की अनुमति दी है।

हालांकि भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा कपास उत्पादक है, लेकिन टेक्सटाइल उद्योग की एक्स्ट्रा-लॉन्ग स्टेपल कपास की मांग को पूरा नहीं कर पाता, इसलिए अमेरिका, मिस्र, ब्राजील और ऑस्ट्रेलिया से आयात करना पड़ता है।

सेब और ड्राई फ्रूट्स आयात से क्या भारतीय किसानों को खतरा?
भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा सेब उत्पादक है, लेकिन बढ़ती आबादी और आय के चलते घरेलू उत्पादन मांग से कम पड़ता है। भारत हर साल करीब 5 लाख मीट्रिक टन सेब ईरान, तुर्की, अफगानिस्तान, अमेरिका और चिली से आयात करता है।

समझौते के तहत अमेरिका से सेब का आयात 25 प्रतिशत रियायती शुल्क और 80 रुपये प्रति किलो न्यूनतम आयात मूल्य पर होगा। इससे 100 रुपये प्रति किलो से कम कीमत वाले सेब के आयात पर रोक लगेगी और भारतीय किसानों को संरक्षण मिलेगा।

ड्राई फ्रूट्स जैसे अखरोट, बादाम और पिस्ता की खपत भी भारत में बढ़ रही है। घरेलू उत्पादन सीमित होने के कारण रियायती आयात से स्थानीय किसानों पर खास असर पड़ने की आशंका नहीं है।

क्या भारतीय किसानों को होगा फायदा?
इस व्यापार समझौते से चाय, कॉफी, मसाले और फलों के भारतीय उत्पादकों को बड़ा फायदा मिलने की उम्मीद है, क्योंकि अमेरिका ने इन उत्पादों को ड्यूटी-फ्री एक्सेस दिया है। इसके अलावा, चावल पर आयात शुल्क घटाकर 18 प्रतिशत किए जाने से बासमती और नॉन-बासमती दोनों किस्मों के निर्यातकों को लाभ मिलने की संभावना है।

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