A man walks past a logo of the Reserve Bank of India (RBI) and the Indian Rupee inside the RBI headquarters in Mumbai, India, December 6, 2024. / REUTERS/Francis Mascarenhas/File Photo
भारत ने विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और रुपये को सहारा देने के लिए प्रवासी भारतीयों की बचत को आकर्षित करने की नई पहल शुरू की है। इसके तहत भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विशेष विदेशी मुद्रा जमा योजना को फिर से खोल दिया है जिससे देश के बैंकिंग तंत्र में अरबों डॉलर आने की उम्मीद है।
आरबीआई की घोषणा के अनुसार भारतीय बैंक अब एनआरआई और ओसीआई से एफसीएनआर(बी) यानी फॉरेन करेंसी नॉन-रेजीडेंट बैंक जमा 30 सितंबर तक जुटा सकेंगे। यह कदम 2013 की उस रणनीति जैसा है जब रुपये में गिरावट के दौरान भारत ने प्रवासी भारतीयों से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित कर मुद्रा को स्थिर करने और विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने में सफलता हासिल की थी।
अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और खाड़ी देशों में रहने वाले भारतीयों को ध्यान में रखते हुए बैंक अब डॉलर जमा पर अधिक आकर्षक ब्याज दरें देने की तैयारी कर रहे हैं। उद्योग के अनुमान के मुताबिक इन जमा योजनाओं पर ब्याज दर 5.5 प्रतिशत से लेकर 7 प्रतिशत से अधिक तक हो सकती है। यह कई डॉलर आधारित बचत और फिक्स्ड-इनकम निवेश विकल्पों के मुकाबले प्रतिस्पर्धी मानी जा रही है।
आरबीआई ने इस योजना को और आकर्षक बनाने के लिए बैंकों को रियायती स्वैप सुविधा भी दी है। इससे बैंक विदेशी मुद्रा जोखिम को कम लागत पर कवर कर सकेंगे और जमाकर्ताओं को बेहतर रिटर्न दे पाएंगे। यह सुविधा तीन से पांच साल की अवधि वाले योग्य जमा खातों पर लागू होगी और 30 सितंबर तक उपलब्ध रहेगी।
पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ अशोक चंद्रा ने कहा कि इस योजना के जरिए बैंकिंग क्षेत्र 35 अरब डॉलर से 40 अरब डॉलर तक जुटा सकता है। कुछ अन्य अनुमान इससे भी अधिक राशि आने की संभावना जता रहे हैं। प्रवासी भारतीयों के लिए यह योजना इसलिए भी आकर्षक है क्योंकि एफसीएनआर(बी) खाते रुपये में नहीं बल्कि विदेशी मुद्राओं में रखे जाते हैं। इससे उन्हें सीधे विनिमय दर के जोखिम का सामना नहीं करना पड़ता।
ऐसे खाते लंबे समय से उन एनआरआई निवेशकों के बीच लोकप्रिय रहे हैं जो भारत से वित्तीय संबंध बनाए रखना चाहते हैं, लेकिन अपनी बचत विदेशी मुद्रा में रखना पसंद करते हैं। आरबीआई का यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं के बीच नीति निर्माता विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत करने और रुपये की स्थिरता बनाए रखने पर ध्यान दे रहे हैं।
साल 2013 में अमेरिकी मौद्रिक नीति को लेकर चिंताओं के कारण उभरते बाजारों से पूंजी निकलने लगी थी। उस समय आरबीआई द्वारा शुरू की गई इसी तरह की एफसीएनआर(बी) योजना के जरिए करीब 34 अरब डॉलर जुटाए गए थे।
भारत दुनिया में सबसे अधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। पिछले वित्त वर्ष में विदेशों में रहने वाले भारतीयों ने 135 अरब डॉलर से अधिक की राशि भारत भेजी थी। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवासी भारतीय समुदाय की बढ़ती भूमिका और महत्व स्पष्ट होता है।
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