हिंदी बनी एक वैश्विक सांस्कृतिक आंदोलन / Amit deshmukh
विश्व हिंदी दिवस अब केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं रहा। यह दिन हर वर्ष हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि हिंदी की यात्रा कहाँ से शुरू हुई थी और आज वह किस मुकाम पर खड़ी है। 14 जनवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) में आयोजित विशेष कार्यक्रम ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि हिंदी अब सिर्फ़ भारत की पहचान नहीं, बल्कि दुनिया के अनेक देशों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु बन चुकी है।
इस कार्यक्रम की सबसे सशक्त और प्रभावशाली आवाज़ बने जापान के पद्मश्री सम्मानित विद्वान प्रोफेसर तोमियो मिज़ोकामी—एक ऐसा नाम, जो हिंदी और भारतीय भाषाओं के वैश्विक प्रसार का पर्याय बन चुका है।
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भाषा से आगे की यात्रा
जब कोई विदेशी विद्वान यह कहता है कि “हिंदी भारत को समझने की कुंजी है”, तो यह कथन केवल भाषा-प्रेम का नहीं, बल्कि भारत की सभ्यता, दर्शन और आत्मा को पहचानने की ईमानदार कोशिश का प्रतीक बन जाता है। प्रो. मिज़ोकामी के शब्दों में हिंदी महज़ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भारत की जीवन-दृष्टि को समझने का प्रवेश-द्वार है।
आज जब दुनिया तकनीक, व्यापार और राजनीति की भाषा में संवाद कर रही है, तब हिंदी का वैश्विक मंच पर उभरना यह सिद्ध करता है कि सांस्कृतिक संवाद किसी भी सॉफ्ट पावर की सबसे मज़बूत नींव होता है।
हिंदी दिवस / Amit deshmukhICCR और सांस्कृतिक कूटनीति
ICCR लंबे समय से भारत की सांस्कृतिक कूटनीति का प्रमुख स्तंभ रहा है। महानिदेशक के. नंदिनी सिंगला का यह कथन कि “भाषा देशों के बीच रिश्तों की सबसे मज़बूत नींव होती है”, आज के वैश्विक परिदृश्य में अत्यंत प्रासंगिक है। जब राजनीतिक रिश्ते अस्थायी हो सकते हैं, तब भाषा और संस्कृति स्थायी संबंधों का निर्माण करती हैं।
ICCR का यह प्रयास केवल हिंदी सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत को समझने, महसूस करने और आत्मसात करने की प्रक्रिया है।
थाईलैंड से सीरिया तक: हिंदी के नए केंद्र
इस कार्यक्रम की सबसे उल्लेखनीय बात थी—थाईलैंड, यूक्रेन, श्रीलंका, अफ़ग़ानिस्तान, तंज़ानिया, उज़्बेकिस्तान और सीरिया जैसे देशों के छात्रों और शोधार्थियों की भागीदारी। ये देश भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से भिन्न हैं, लेकिन हिंदी ने इन्हें एक साझा मंच पर ला खड़ा किया।
प्रोफेसर तोमियो मिज़ोकामी / Amit deshmukh
जब थाईलैंड की वेनासावी हिंदी को भारत से भावनात्मक जुड़ाव का माध्यम बताती हैं, या यूक्रेन की वैलेरिया इसे संस्कृतियों के बीच सेतु कहती हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि हिंदी अब किसी एक भूभाग की भाषा नहीं रही।
श्रीलंका की सिल्वा द्वारा प्रस्तुत हिंदी गीत यह साबित करता है कि भाषा केवल शब्दों से नहीं, बल्कि भावनाओं से संवाद करती है। अफ़ग़ानिस्तान, तंज़ानिया और उज़्बेकिस्तान के छात्रों के अनुभव बताते हैं कि हिंदी उन्हें भारत की सोच, मूल्यों और सामाजिक संरचना को समझने का अवसर देती है।
हिंदी और वैश्विक मान्यता का प्रश्न
प्रो. मिज़ोकामी का यह कहना कि हिंदी में संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनने और नोबेल पुरस्कार पाने की पूरी क्षमता है—कोई भावनात्मक वक्तव्य नहीं, बल्कि एक गहन आकलन है। आज हिंदी दुनिया की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है। इसकी साहित्यिक परंपरा, सामाजिक प्रभाव और सांस्कृतिक विस्तार इसे वैश्विक मान्यता के योग्य बनाते हैं।
समस्या क्षमता की नहीं, बल्कि संस्थागत प्रयासों, अनुवाद, अकादमिक समर्थन और वैश्विक मंचों पर सशक्त प्रस्तुति की है। यदि भारत अपनी भाषाई विरासत को रणनीतिक रूप से आगे बढ़ाए, तो हिंदी का अंतरराष्ट्रीय कद और अधिक मजबूत हो सकता है।
युवाओं के लिए संदेश
प्रो. मिज़ोकामी का युवाओं के लिए संदेश विशेष रूप से विचारणीय है। आज भाषा को अक्सर रोज़गार से जोड़कर देखा जाता है, जबकि भाषा उससे कहीं अधिक है। भाषा सभ्यता की स्मृति होती है, संस्कृति की आत्मा होती है और भविष्य की दिशा तय करती है।
हिंदी सीखना या उसे अपनाना केवल करियर का निर्णय नहीं, बल्कि संस्कृतियों को जोड़ने की वैश्विक प्रक्रिया में भागीदारी है।
भारत–जापान संबंधों का मानवीय पक्ष
84 वर्षीय प्रो. मिज़ोकामी का जीवन स्वयं भारत–जापान मैत्री का जीवंत उदाहरण है। छह भारतीय भाषाओं का अध्ययन, दशकों तक अध्यापन और आज भी हिंदी के लिए सक्रिय भूमिका—यह सब किसी औपचारिक दायित्व से नहीं, बल्कि गहरे सांस्कृतिक प्रेम से प्रेरित है। 2018 में मिला पद्मश्री सम्मान इस बात की पुष्टि करता है कि भारत अपने सच्चे सांस्कृतिक मित्रों को पहचानता है।
विश्व हिंदी दिवस पर ICCR में हुआ यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि हिंदी एक वैश्विक सांस्कृतिक चेतना बन चुकी है। थाईलैंड से सीरिया तक, यूक्रेन से तंज़ानिया तक, हिंदी आज संवाद, समझ और सहयोग की भाषा बन रही है।
प्रो. तोमियो मिज़ोकामी जैसे विद्वान इस आंदोलन के सबसे मज़बूत स्तंभ हैं। उनकी उपस्थिति यह याद दिलाती है कि भाषा सीमाएँ नहीं देखती—वह दिलों को जोड़ती है। और शायद यही हिंदी की सबसे बड़ी ताक़त है।
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