पाकिस्तान राष्ट्रीय ध्वज / IANS
पाकिस्तान की निवेश स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही है। ताज़ा आंकड़े और हालिया घटनाक्रम बताते हैं कि तमाम नीतिगत प्रयासों के बावजूद देश घरेलू और विदेशी निवेश आकर्षित करने में असफल रहा है।
पाकिस्तान का निवेश-से-जीडीपी अनुपात करीब 13.1 प्रतिशत पर अटका हुआ है, जो क्षेत्रीय औसत 30 प्रतिशत से कहीं कम है। इससे पाकिस्तान अपने पड़ोसी देशों की तुलना में सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया है, जहां उच्च निवेश ने विकास, उत्पादकता और प्रतिस्पर्धा को गति दी है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह अंतर अल्पकालिक झटकों से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संरचनात्मक समस्याओं का नतीजा है।
इस स्थिति ने स्पेशल इन्वेस्टमेंट फैसिलिटेशन काउंसिल (SIFC) पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे दो साल पहले बड़े निवेशों को तेजी से मंजूरी देने और नौकरशाही अड़चनों को दूर करने के उद्देश्य से शुरू किया गया था। नागरिक और सैन्य नेतृत्व के समर्थन से बनी इस संस्था को पाकिस्तान की सुस्त अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने का मजबूत मंच बताया गया था।
हालांकि, दो साल बाद भी SIFC का प्रदर्शन उम्मीदों से काफी कम रहा है। व्यापक अधिकार और शीर्ष स्तर के समर्थन के बावजूद परिषद बड़े निवेश प्रवाह लाने में नाकाम रही। कई हाई-प्रोफाइल बैठकों और घोषणाओं के बावजूद अधिकतर प्रस्तावित परियोजनाएं अब भी चर्चा के स्तर पर ही अटकी हैं।
निवेशकों के भरोसे में खास सुधार नहीं हुआ है और पूंजी प्रवाह कमजोर बना हुआ है। यहां तक कि नीति-निर्माण से जुड़े हलकों में भी अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि SIFC अपने वादों पर खरा नहीं उतर सका।
इसके बावजूद, रणनीति में बदलाव के बजाय सरकार उसी रास्ते पर आगे बढ़ती दिख रही है। हाल ही में इस्लामाबाद में आयोजित पाकिस्तान बिजनेस काउंसिल सम्मेलन में SIFC के राष्ट्रीय समन्वयक ने स्वीकार किया कि जब तक घरेलू निवेशकों का भरोसा बहाल नहीं होगा, तब तक विदेशी निवेश की उम्मीद करना मुश्किल है। उन्होंने संकेत दिया कि सरकार बड़े स्थानीय कारोबारी समूहों को अधिक समर्थन देगी।
हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि यह तरीका मूल समस्या से ध्यान भटकाने वाला है। उनका कहना है कि चुनिंदा प्रभावशाली निवेशकों को विशेष रियायतें देना उस असमान कारोबारी माहौल को और मजबूत करता है, जिसने दशकों से निवेश को हतोत्साहित किया है।
आलोचकों के मुताबिक, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से चयनात्मक प्रोत्साहनों पर निर्भर रही है, जहां रसूखदार कंपनियों को राहत और विशेषाधिकार मिलते हैं, जबकि बाकी निजी क्षेत्र लालफीताशाही, अनिश्चित कर नीति और बार-बार बदलते नियमों से जूझता रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि SIFC ने इस मॉडल को सुधारने के बजाय एक समानांतर व्यवस्था बनाकर इसे और संस्थागत रूप दे दिया है, जिससे निवेश संकट और गहराने की आशंका बढ़ गई है।
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