प्रतीकात्मक तस्वीर / iStock photo
ट्रम्प प्रशासन के सत्ता में आने के एक साल के भीतर, भारत और अमेरिका के संबंधों ने एक नाटकीय यू-टर्न लिया है। शुरुआती तनाव और भारी टैरिफ (शुल्क) के बाद, अब दोनों देशों के बीच 6 फरवरी को हुए 'अंतरिम व्यापार समझौते' ने आर्थिक संबंधों को पूरी तरह बदल दिया है। यह समझौता दुनिया के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों के बीच एक पीढ़ी के सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक पुनर्गठन का प्रतिनिधित्व करता है।
इस समझौते के तहत भारत ने अमेरिकी औद्योगिक वस्तुओं पर टैरिफ को 50 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है, साथ ही भविष्य में इसे शून्य तक ले जाने का मार्ग भी प्रशस्त किया है। इसके बदले में भारत ने $500 बिलियन की खरीद प्रतिबद्धता जताई है।
प्रमुख क्षेत्रों को मिलेगा बड़ा फायदा
यह समझौता केवल टैरिफ कम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह फार्मास्युटिकल्स, एआई और रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में सहयोग के नए द्वार खोलता है; जहाँ एक ओर भारतीय जेनेरिक दवाओं की अमेरिकी बाजार में पैठ और मजबूत होगी, वहीं सेमीकंडक्टर और जीपीयू (GPU) जैसी तकनीकों में चीन पर निर्भरता कम करने के लिए सप्लाई चेन को सशक्त बनाया जाएगा। इसके साथ ही, बोइंग विमानों के लिए भारत की $80 बिलियन की प्रतिबद्धता और 25 करोड़ छात्रों वाले शिक्षा क्षेत्र में अमेरिकी एड-टेक कंपनियों का प्रवेश, कृषि और कपड़ा उद्योगों में आपसी बाजार पहुंच के साथ मिलकर दोनों देशों के आर्थिक संबंधों को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा।
चुनौतियां और भू-राजनीतिक पहलू
यह समझौता महज एक व्यापारिक सौदा नहीं है, बल्कि एक व्यापक भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। पिछले 10 महीनों के तनाव के बाद, रूस-यूक्रेन संकट, चीन की आक्रामकता और ऊर्जा सुरक्षा जैसे मुद्दों ने दोनों देशों को एक मंच पर ला दिया है।
इस ऐतिहासिक समझौते के कार्यान्वयन में अभी भी कई चुनौतियां बरकरार हैं, जिनमें भारत की जटिल राज्य-स्तरीय नियामक प्रणाली और डेटा स्थानीयकरण जैसे तकनीकी मुद्दे शामिल हैं, साथ ही अमेरिका में रोजगार सुरक्षा और भारत में किसानों की आय जैसी गहरी राजनीतिक संवेदनशीलताएं भी जुड़ी हैं; ऐसे में यह सुनिश्चित करना अनिवार्य होगा कि यह सौदा किसी भी पक्ष के घरेलू हितों को नुकसान न पहुँचाए, जबकि इस अंतरिम समझौते को मार्च 2026 के मध्य तक औपचारिक संधि के रूप में अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों की राय
व्यापार विशेषज्ञों का मानना है कि अब सफलता केवल टैरिफ चार्ट पढ़ने से नहीं मिलेगी। कंपनियों को भू-राजनीतिक विश्लेषण, वास्तविक समय की नियामक निगरानी और जोखिम प्रबंधन को अपनी रणनीति का हिस्सा बनाना होगा। जो कंपनियां इस 'रणनीतिक पुनर्गठन' को समझकर निवेश करेंगी, उनके लिए भारत की 1.4 अरब उपभोक्ताओं वाली अर्थव्यवस्था में अपार अवसर हैं।
चक मेली: ये 'लाइटहाउस पब्लिक एडवाइजर्स' (Lighthouse Public Advisors) के संस्थापक हैं। वे सरकारी संबंधों और बाजार प्रवेश रणनीतियों (Market Entry Strategy) के विशेषज्ञ माने जाते हैं।
राजेश मेहता: ये 'लाइटहाउस पब्लिक एडवाइजर्स' में वरिष्ठ सलाहकार हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार विकास (International Business Development) के क्षेत्र में जाने-माने विशेषज्ञ हैं।
इस लेख में व्यक्त किए गए विचार और राय लेखकों के अपने हैं और ये आवश्यक रूप से 'न्यू इंडिया अब्रॉड' (New India Abroad) की आधिकारिक नीति या स्थिति को प्रतिबिंबित नहीं करते हैं।
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