Richard Rossow, senior advisor and Chair on India and Emerging Asia Economics at the Centre for Strategic and International Studies / IANS
2025 में भारत–अमेरिका संबंधों में शुरुआती कूटनीतिक गर्मजोशी के बाद व्यापारिक मतभेद और भू-राजनीतिक असहमतियां सामने आईं, लेकिन अब दोनों देशों के रिश्ते धीरे-धीरे स्थिर होते दिख रहे हैं और 2026 को लेकर सकारात्मक उम्मीदें बन रही हैं। यह कहना है अमेरिका स्थित भारत मामलों के वरिष्ठ विशेषज्ञ रिचर्ड रोसो का।
सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) में इंडिया और इमर्जिंग एशिया इकोनॉमिक्स के सीनियर एडवाइजर व चेयर रिचर्ड रोसो ने IANS को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत ने ट्रम्प प्रशासन के साथ शुरुआती दौर में अन्य देशों की तुलना में बेहतर शुरुआत की। इसमें राष्ट्राध्यक्ष स्तर की बैठक और क्वाड विदेश मंत्रियों की बैठक जैसी पहल शामिल रहीं।
हालांकि, इसके बाद भारत–पाकिस्तान मुद्दे को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं और भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका की आपत्तियों ने रिश्तों में खटास पैदा की। रोसो के मुताबिक, इन्हीं कारणों से अतिरिक्त व्यापारिक प्रतिबंध भी लगाए गए।
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इसके बावजूद उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर अपेक्षाकृत शांत है। रोसो ने कहा, “अब तक व्यापार समझौता नहीं हुआ है, लेकिन रोज़ाना की तल्ख बयानबाजी भी नहीं दिखती। यह 2026 के लिए बेहतर माहौल बना सकता है।”
व्यापार पर मतभेद, लेकिन बदलाव भी
रोसो ने माना कि भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए एक चुनौतीपूर्ण बाजार रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पहले कार्यकाल के बाद से कुछ नीतियों के चलते अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत में निर्यात मुश्किल हुआ, जिसका असर आज भी अमेरिकी नजरिए पर दिखता है, खासकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के दौर में।
हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत की व्यापार नीति में बड़ा बदलाव आया है। आयात शुल्क में कटौती, स्थानीय विनिर्माण की अनिवार्यता में ढील और ऑस्ट्रेलिया व संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के साथ बड़े व्यापार समझौते इसके उदाहरण हैं।
रोसो ने कहा, “अगर आप बारीकियों पर ध्यान न दें, तो आपको एहसास ही नहीं होगा कि भारत की व्यापार नीति कितनी बदल चुकी है।” उनके मुताबिक, भारत अब वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ने के लिए व्यापार को एक अहम जरिया मान रहा है।
व्यापार आंकड़े मजबूत
राजनीतिक “उतार-चढ़ाव” के बावजूद भारत–अमेरिका व्यापार में मजबूती बनी हुई है। रोसो ने कहा, “आयात और निर्यात दोनों में साल-दर-साल बढ़ोतरी दिख रही है।” उन्होंने अनुमान जताया कि 2025 में द्विपक्षीय व्यापार वृद्धि उच्च सिंगल डिजिट में रह सकती है, हालांकि हाल के महीनों में अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात में कुछ गिरावट देखी गई है।
कृषि सबसे बड़ी अड़चन
रोसो के अनुसार, व्यापार समझौते में सबसे बड़ी बाधा कृषि क्षेत्र है। अमेरिका भारतीय बुनियादी कृषि उत्पादों तक व्यापक पहुंच चाहता है, जो भारत के लिए राजनीतिक और सामाजिक रूप से संवेदनशील मुद्दा है। उन्होंने कहा, “यह खतरनाक क्षेत्र है, क्योंकि भारत में बड़ी आबादी खेती पर निर्भर है और उनके पास वैकल्पिक रोजगार के सीमित अवसर हैं।” भारत के रुख का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि उदारीकरण चरणबद्ध तरीके से ही किया जा सकता है, ताकि लोगों की आजीविका पर अचानक असर न पड़े।
निवेश और सुधार
रोसो ने भारत के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सेक्टर में अमेरिकी कंपनियों के अरबों डॉलर के निवेश को दीर्घकालिक सोच का नतीजा बताया। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में दुनिया की तीन सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं होंगी और भारत मध्य शताब्दी तक 20 से 25 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। सुधारों पर उन्होंने कहा कि मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की शुरुआत धीमी रही, लेकिन हाल के महीनों में जीएसटी में बदलाव और बीमा क्षेत्र में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति जैसे कदमों से नई तेजी दिखी है।
2026 होगा अहम
रोसो के मुताबिक, 2026 की पहली तिमाही निर्णायक साबित हो सकती है। इसमें संभावित व्यापार समझौता, अमेरिकी राष्ट्रपति की भारत यात्रा, क्वाड नेताओं की बैठक और फरवरी में प्रस्तावित एआई समिट शामिल हैं। साथ ही, राज्यों के चुनाव भी भारत की सुधार क्षमता को प्रभावित करेंगे।
उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में भारत की सुरक्षा नीति मजबूत हुई है और अमेरिका के साथ रक्षा व रणनीतिक सहयोग गहरा हुआ है। “लोगों के रिश्ते, व्यापारिक रिश्ते और सुरक्षा सहयोग — यही वह गोंद है जो इस रिश्ते को जोड़े रखता है,” रोसो ने कहा।
पिछले दस वर्षों में भारत और अमेरिका ने रक्षा, तकनीक और क्वाड जैसे मंचों पर सहयोग बढ़ाया है। व्यापार और वैश्विक मुद्दों पर मतभेदों के बावजूद, दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार लगातार बढ़ा है और अमेरिका भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है।
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