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'भारतीय जड़ों का है अपना महत्व', अमेरिका जन्मी बच्ची की कस्टडी पर दिल्ली हाईकोर्ट

यह दंपति भारतीय नागरिक हैं और 2011 में शादी के बंधन में बंधे थे। उनकी बेटी का जन्म 2015 में अमेरिका में हुआ था और वह जन्म से अमेरिकी नागरिक है।

 सांकेतिक तस्वीर सांकेतिक तस्वीर / Pexels

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक भारतीय-अमेरिकी बच्ची की कस्टडी मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि अमेरिकी अदालत के आदेशों का सम्मान जरूरी है लेकिन बच्चे के हित को सबसे ऊपर रखा जाएगा। दरअसल अमेरिका की एक अदालत ने मई 2022 में बच्चे की कस्टडी मां को दी थी। 

जबकि पिता को हफ्ते में एक बार निगरानी में मिलने की अनुमति दी गई थी। इसके बाद जुलाई 2022 में मां भारत आ गई। इसके बाद पिता ने फिर से अमेरिकी अदालत का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने इस बार पिता के पक्ष में फैसला दिया और पूरी कस्टडी उसे दे दी।

आपको बताएं कि यह दंपति भारतीय नागरिक हैं और 2011 में शादी के बंधन में बंधे थे। उनकी बेटी का जन्म 2015 में अमेरिका में हुआ था और वह जन्म से अमेरिकी नागरिक है। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि विदेशी नागरिकता वाले बच्चों के मामलों में भी सबसे जरूरी चीज बच्चे का हित होता है।

अदालत ने कहा कि बच्चे की विदेशी नागरिकता या विदेशी अदालत के आदेश अंतिम फैसला तय करने वाले नहीं हो सकते। दो जजों की पीठ ने कहा कि सिर्फ इसलिए कि बच्चा जन्म से अमेरिकी नागरिक है या कुछ साल वहां रहा है यह तय नहीं करता कि उसके हित में क्या सही है।

अदालत ने आगे कहा कि अमेरिकी अदालत का आदेश सम्मान के योग्य है लेकिन वह अकेला फैसला तय नहीं कर सकता। खासकर तब जब बच्चा लंबे समय से भारत में रह रहा हो और यहां उसकी जड़ें मजबूत हो चुकी हों। अदालत ने ध्यान दिया कि बच्ची अब 11 साल की है और काफी समय से भारत में रह रही है और पढ़ाई कर रही है। इससे उसके भारत से गहरे संबंध बन गए हैं।

अदालत ने यह भी चिंता जताई कि अमेरिकी अदालत के आदेश को मानने से मां को मजबूरन अमेरिका जाना पड़ेगा। हमें बताया गया है कि दोनों माता-पिता भारतीय नागरिक हैं। पिता को अमेरिका में काम करने की अनुमति है लेकिन मां के पास ऐसी अनुमति नहीं है।

पीठ ने कहा कि ऐसे में बच्ची को अमेरिका भेजने का मतलब होगा कि मां को भी उसके साथ जाना पड़े, जबकि यह स्पष्ट नहीं है कि वह वहां कितने समय तक रह पाएगी। अंत में दिल्ली हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की याचिकाएं खारिज कर दीं। अदालत ने कहा कि माता-पिता भारत की अदालतों में नए सिरे से कस्टडी और अभिभावकता के लिए आवेदन कर सकते हैं।

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