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भारत-EU मुक्त व्यापार समझौता: मौके बड़े, पर यूरोप की सख्त नियमावली असली चुनौती

भारत-EU FTA की असली परीक्षा इसके लागू होने में नहीं, बल्कि EU की सख़्त नियामक व्यवस्था के असर को कम करने और भारतीय उद्योग की तैयारी में छिपी है।

प्रतीकात्मक तस्वीर / EU Trade - European Union

भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच द्विपक्षीय व्यापार ने हाल के वर्षों में लगातार मजबूती दिखाई है, जिससे हाल ही में संपन्न भारत-EU मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की रणनीतिक अहमियत और बढ़ गई है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत-EU वस्तु व्यापार का मूल्य लगभग 11.5 लाख करोड़ रुपये (136.5 अरब डॉलर) रहा, जिसमें भारतीय निर्यात करीब 6.4 लाख करोड़ रुपये (75.9 अरब डॉलर) का था। सेवाओं के व्यापार में भी स्थिर बढ़ोतरी दर्ज की गई, जो 2024 में 7.2 लाख करोड़ रुपये (83.1 अरब डॉलर) तक पहुंच गया।

FTA के तहत भारत को EU बाजार में 97 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर तरजीही पहुंच मिली है, जो कुल व्यापार मूल्य का 99.5 प्रतिशत कवर करती है। वहीं, भारत ने EU के निर्यात के लिए 92.1 प्रतिशत टैरिफ लाइनों पर रियायतें दी हैं, जो 97.5 प्रतिशत व्यापार मूल्य को कवर करती हैं। इन रियायतों में तत्काल शुल्क समाप्ति, चरणबद्ध कटौती और टैरिफ-रेट कोटा शामिल हैं।

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हालांकि, भारत ने डेयरी, अनाज, पोल्ट्री, सोयामील और कुछ फलों-सब्जियों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को सुरक्षित रखा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समझौते में घरेलू आर्थिक हितों का भी ध्यान रखा गया है। निवेश संरक्षण समझौते और भौगोलिक संकेत (GI) से जुड़े अलग समझौतों पर बातचीत अभी जारी है, जबकि पेशेवरों की आवाजाही से जुड़े प्रावधान समझौते को और रणनीतिक गहराई देते हैं।

यह FTA ऐसे समय में हुआ है जब वैश्विक व्यापार अनिश्चितता और संरक्षणवाद बढ़ रहा है। लेकिन इसकी टाइमिंग इसलिए भी अहम है क्योंकि 1 जनवरी 2026 से EU द्वारा भारत को मिलने वाली जनरलाइज्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) की सुविधाएं पूरी तरह समाप्त हो जाएंगी। इसके बाद खनिज, रसायन, प्लास्टिक, वस्त्र, आभूषण, लोहा-इस्पात जैसे प्रमुख भारतीय निर्यात MFN टैरिफ के दायरे में आ जाएंगे।

GSP की समाप्ति से कपड़ा और फुटवियर जैसे मूल्य-संवेदनशील क्षेत्रों में भारतीय निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है और EU के खरीदार बांग्लादेश या वियतनाम जैसे देशों की ओर रुख कर सकते हैं। हालांकि, FTA के लागू होने के बाद इन नुकसान की आंशिक भरपाई संभव है, लेकिन इसकी औपचारिक मंजूरी में समय लग सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, असली चुनौती टैरिफ नहीं बल्कि EU की नई नियामक बाधाएं हैं। कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म (CBAM), EU डिफॉरेस्टेशन रेगुलेशन (EUDR) और कॉरपोरेट सस्टेनेबिलिटी ड्यू डिलिजेंस (CSDD) जैसे नियम भारतीय निर्यातकों के लिए गैर-टैरिफ बाधाएं बन सकते हैं। खासकर स्टील, एल्युमिनियम और कृषि उत्पाद इन नियमों से प्रभावित होंगे।

इन नियमों के तहत विस्तृत सप्लाई-चेन डेटा, ट्रेसबिलिटी और रिपोर्टिंग की मांग की जाती है, जिसके लिए भारत के छोटे और मध्यम उद्योग (SMEs) फिलहाल पूरी तरह तैयार नहीं हैं। इससे अनुपालन लागत बढ़ने और टैरिफ लाभ खत्म होने का खतरा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, उद्योग संगठनों और निर्यात संवर्धन परिषदों को मिलकर घरेलू उद्योग की तैयारी मजबूत करनी होगी। साथ ही, EU के सस्टेनेबिलिटी नियमों को भारत के अपने डिकार्बोनाइजेशन और सप्लाई-चेन सुधार लक्ष्यों के साथ जोड़कर देखा जाए तो लंबे समय में यह भारतीय निर्यातकों के लिए फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

हिमांशु इनफीसुम (InfiSum) में रिसर्च फ़ेलो हैं, जबकि बद्री नारायणन इनफीसुम के निदेशक और संस्थापक हैं।

(इस लेख में व्यक्त विचार और राय लेखकों के निजी हैं और आवश्यक नहीं कि वे न्यू इंडिया अब्रॉड की आधिकारिक नीति या दृष्टिकोण को दर्शाते हों।)

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