सांकेतिक चित्र.. / AI image/IANS
भारत इस समय तेज आर्थिक विकास और कम महंगाई के संतुलित दौर में है, जिसे अर्थशास्त्री 'गोल्डीलॉक्स फेज' कह रहे हैं। मंगलवार को जारी एचएसबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि अब नीतियों को न तो बहुत सख्त और न ही बहुत ढीला रखना चाहिए, बल्कि एक संतुलित यानी लगभग तटस्थ नीति अपनाई जानी चाहिए।
एचएसबीसी ग्लोबल इन्वेस्टमेंट रिसर्च की रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026 में बाजार और पूरी अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए ऐसी नीति सबसे बेहतर होगी, जिसमें सरकारी खर्च पर नियंत्रण रखा जाए और साथ ही ब्याज दरें आसान बनी रहें।
रिपोर्ट के अनुसार, अगर सरकार खर्च में सावधानी रखे और रिजर्व बैंक ब्याज दरों को आसान बनाए रखे, तो इससे अर्थव्यवस्था में बेहतर संतुलन बनेगा और सभी तरह के निवेश को फायदा होगा।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि अर्थव्यवस्था में कुछ अंदरूनी कमजोरियां अब भी मौजूद हैं। इनमें कंपनियों द्वारा कम निवेश और विदेशों से कम पूंजी आना शामिल है, जिन पर ध्यान देना जरूरी है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि बॉन्ड मार्केट्स ने 2026 की शुरुआत में राज्यों द्वारा ज्यादा कर्ज लेने की संभावना को पहले ही ध्यान में रख लिया है। इसके साथ ही, आरबीआई द्वारा बॉन्ड खरीद, बजट में वित्तीय अनुशासन और भारत को ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल किए जाने से विदेशी निवेश आने की उम्मीद है।
रिपोर्ट के अनुसार, हाल के आर्थिक सुधारों, सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी और शेयरों के उचित दामों की वजह से शेयर बाजार को फायदा मिल सकता है। लेकिन लंबे समय तक लाभ पाने के लिए कंपनियों के निवेश और विदेशी निवेश को बढ़ाने वाले बड़े सुधार जरूरी हैं।
एचएसबीसी की चीफ इंडिया इकोनॉमिस्ट प्रांजुल भंडारी ने तर्क दिया कि उनके रिसर्च फर्म के अनुमान के अनुसार, अगले साल महंगाई दर चार प्रतिशत से थोड़ी कम रहेगी, जिससे आरबीआई पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव नहीं रहेगा और अगर विकास की रफ्तार धीमी होती है, तो ब्याज दरें और कम करने की गुंजाइश भी रहेगी।
उन्होंने आगे कहा कि अगर विकास दर कमजोर पड़ती है, तो और राहत दी जा सकती है। यह स्थिति बाजार की मौजूदा सोच से बिल्कुल उलट है, जहां लोग सख्त मौद्रिक नीति और ढीली वित्तीय नीति की उम्मीद कर रहे हैं।
प्रांजुल भंडारी ने यह भी बताया कि दुनिया भर में बहुत सी घटनाएं चल रही हैं, जैसे टैरिफ से जुड़ी खबरें, ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में शामिल होने की प्रक्रिया और विकसित देशों में ब्याज दरों का बढ़ना, जो भारतीय बाजार को प्रभावित कर सकती हैं।
रिपोर्ट में बताया गया है कि केंद्र सरकार का लक्ष्य है कि वर्ष 2031 तक सार्वजनिक कर्ज को महामारी से पहले के स्तर तक लाया जाए। इसके लिए अगले पांच वर्षों तक लगातार वित्तीय सुधार और खर्च पर नियंत्रण जरूरी होगा।
रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार द्वारा किया गया यह वित्तीय संतुलन निजीकरण के जरिए पूरा किया जा सकता है, जिससे आर्थिक विकास पर ज्यादा असर नहीं पड़ेगा।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई राज्यों में सार्वजनिक कर्ज बढ़ने की संभावना है, हालांकि 3 प्रतिशत की वित्तीय घाटे की सीमा होने के कारण घाटे को नियंत्रित रखा जाएगा।
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